Mohan Bhagwat on PM Modi and Saints: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) ने हाल ही में ‘विहार सेवा ऊर्जा मिलन’ कार्यक्रम के दौरान एक अहम विचार साझा किया। अपने संबोधन में उन्होंने संतों की भूमिका, समाज में उनकी स्थिति और शासन-व्यवस्था से उनके संबंधों पर खुलकर बात की। इसी क्रम में उन्होंने यह भी कहा कि देश के प्रधानमंत्री भी संतों को ‘ना’ कहने में हिचकते हैं, क्योंकि संत उस सत्य के मार्ग पर चलते हैं जिस पर धर्म आधारित है। यह बयान सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय समाज, संस्कृति और शासन की उस सोच को दर्शाता है जिसमें संतों को नैतिक दिशा सूचक माना जाता रहा है।
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मोहन भागवत का स्पष्ट संदेश
मोहन भागवत ने अपने वक्तव्य में कहा कि जो लोग धर्म के मूल सत्य का पालन करते हैं, वही संत कहलाते हैं। उनके अनुसार संत केवल धार्मिक व्यक्ति नहीं होते, बल्कि वे समाज के लिए नैतिक आधार, संयम और सत्य का प्रतीक होते हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि संतों का सम्मान और संरक्षण करना समाज और शासन दोनों का कर्तव्य है। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री द्वारा संतों को ‘ना’ कहने में हिचकिचाहट को उन्होंने एक स्वाभाविक और सम्मानजनक भावना बताया।

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भारतीय परंपरा में संतों की भूमिका
भारत की सभ्यता में संत-परंपरा हजारों वर्षों पुरानी है। संतों ने समय-समय पर समाज को सही दिशा दिखाई है चाहे वह सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाना हो, धर्म और नीति का प्रचार करना हो या सत्ता को नैतिक सीमाओं की याद दिलाना हो। तुलसीदास, कबीर, गुरु नानक, विवेकानंद जैसे संतों ने केवल आध्यात्मिक संदेश नहीं दिया, बल्कि सामाजिक चेतना को भी जगाया। मोहन भागवत के बयान को इसी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए, जहां संतों को सत्ता से ऊपर नैतिक मार्गदर्शक माना गया है।
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प्रधानमंत्री और संतों का संबंध
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) का संतों और धार्मिक गुरुओं से संवाद कोई नई बात नहीं है। वे अक्सर सार्वजनिक मंचों पर संतों, साधुओं और धर्माचार्यों से मुलाकात करते हैं और उनके विचारों को सम्मानपूर्वक सुनते हैं। मोहन भागवत के अनुसार, यह सम्मान किसी राजनीतिक मजबूरी का परिणाम नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा और संस्कृति की सहज अभिव्यक्ति है।
‘ना’ कहने की हिचकिचाहट का अर्थ क्या है?
यहां ‘ना’ कहने की हिचकिचाहट को कमजोरी या निर्णयहीनता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मोहन भागवत के कथन का आशय यह है कि संतों का जीवन सत्य, त्याग और समाजहित पर आधारित होता है, इसलिए उनके विचारों को अनदेखा करना या सीधे खारिज करना आसान नहीं होता। यह हिचकिचाहट सम्मान से उपजी होती है, न कि दबाव से।
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धर्म, सत्ता और संतुलन
मोहन भागवत ने अपने वक्तव्य के जरिए यह संकेत भी दिया कि धर्म और सत्ता के बीच संतुलन बेहद जरूरी है। धर्म यदि केवल कर्मकांड तक सीमित रह जाए तो वह समाज को दिशा नहीं दे सकता, और सत्ता यदि नैतिक मूल्यों से कट जाए तो वह जनविश्वास खो देती है। संत इस संतुलन की कड़ी होते हैं।
RSS की विचारधारा और संत सम्मान
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh) की विचारधारा में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ-साथ नैतिक अनुशासन को भी महत्वपूर्ण माना गया है। मोहन भागवत का यह बयान RSS की उसी सोच को दर्शाता है, जिसमें समाज को जोड़ने वाले तत्वों—जैसे संत, परंपरा और मूल्य को विशेष स्थान दिया जाता है।
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राजनीतिक व्याख्या से परे बयान
हालांकि इस बयान को राजनीतिक चश्मे से भी देखा जा सकता है, लेकिन मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहीं भी किसी दल या राजनीतिक एजेंडे की बात नहीं की। उनका फोकस समाज, संस्कृति और नैतिक जिम्मेदारी पर था। यह बयान सत्ता और संतों के रिश्ते को टकराव की बजाय संवाद और सम्मान के रूप में प्रस्तुत करता है।
समाज के लिए क्या संदेश निकलता है?
मोहन भागवत के इस कथन से आम समाज के लिए भी एक स्पष्ट संदेश निकलता है
- सत्य और धर्म का पालन करने वालों का सम्मान होना चाहिए
- संतों को केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक मार्गदर्शक समझा जाना चाहिए
- सत्ता और समाज दोनों को नैतिक मूल्यों से जुड़ा रहना चाहिए
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‘विहार सेवा ऊर्जा मिलन’ कार्यक्रम में मोहन भागवत का बयान संतों की सामाजिक भूमिका को एक बार फिर केंद्र में लाता है। प्रधानमंत्री द्वारा संतों को ‘ना’ कहने में हिचकिचाहट को उन्होंने भारतीय संस्कृति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति बताया, न कि किसी राजनीतिक विवशता का संकेत। यह बयान याद दिलाता है कि भारत में सत्ता केवल प्रशासनिक संरचना नहीं है, बल्कि वह संस्कृति, परंपरा और नैतिकता से भी गहराई से जुड़ी हुई है।
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