Murugappa Group Related Party Transaction: यह कहानी सिर्फ़ एक कॉरपोरेट घोटाले की नहीं है, बल्कि उस दोहरे चरित्र की भी है जो खुद को राष्ट्रवाद, नैतिकता और पारदर्शिता का ठेकेदार बताने वाले कट्टरपंथी तबकों में बार-बार सामने आता है। खोजी पत्रकार अनिरुद्ध बहल के खुलासे ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि जब बात बड़े उद्योग समूहों की आती है, तो नैतिकता अचानक मौन क्यों हो जाती है। आरोप है कि मुरुगप्पा ग्रुप की कंपनियों में 10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा के रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शन हुए हैं, और हैरानी की बात यह है कि जो लोग छोटी-सी अनियमितता पर देशद्रोह का तमगा चिपकाने में देर नहीं लगाते, वे यहां आंख मूंदे बैठे हैं।
READ MORE: भारत-न्यूजीलैंड एफटीए से निवेशकों का भरोसा मजबूत, कट्टरपंथी सोच पर पड़ेगा विकास का भारी असर
रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शन कोई अपने-आप में अवैध शब्द नहीं है, लेकिन जब इसकी मात्रा हजारों करोड़ में पहुंच जाए, जब एक ही समूह की कंपनियां आपस में लेन-देन कर मुनाफे, घाटे और बैलेंस शीट को मनचाहे ढंग से सजाने लगें, तब सवाल उठना स्वाभाविक है। अनिरुद्ध बहल का दावा है कि मुरुगप्पा ग्रुप से जुड़ी कई इकाइयों में ऐसे लेन-देन हुए, जिनका सीधा फायदा प्रमोटर परिवार या उससे जुड़ी संस्थाओं को मिला। सवाल यह नहीं है कि कागजों में सब कुछ नियमों के मुताबिक दिख रहा है या नहीं, सवाल यह है कि क्या यह निवेशकों, कर्मचारियों और आम जनता के साथ ईमानदारी है।
READ MORE: सशक्त तस्वीर, आत्मनिर्भर भारत की ओर बढ़ती नारी शक्ति
यहीं से कटाक्ष शुरू होता है उन कट्टरपंथियों पर, जो हर बहस को धर्म, राष्ट्र और संस्कृति की आड़ में मोड़ देते हैं। जब किसी अल्पसंख्यक कारोबारी या किसी राजनीतिक विरोधी पर आरोप लगता है, तो ये लोग रातों-रात टीवी स्टूडियो और सोशल मीडिया अदालतें सजा सुना देती हैं। लेकिन जब देश के बड़े, स्थापित और सम्मानित उद्योग घरानों पर हजारों करोड़ के सवाल उठते हैं, तो वही आवाजें अचानक देश की अर्थव्यवस्था, निवेश माहौल और “नेशनल इंटरेस्ट” की दुहाई देने लगती हैं। क्या नेशनल इंटरेस्ट सिर्फ़ ताकतवरों के लिए आरक्षित है?
READ MORE: नितिन नबीन के पटना आगमन पर जोरदार स्वागत, कार्यकर्ताओं में दिखा उत्साह
अनिरुद्ध बहल जैसे पत्रकार इसलिए असहज कर देते हैं क्योंकि वे आईने की तरह सच सामने रख देते हैं। उनका आरोप किसी राजनीतिक दल से प्रेरित नहीं, बल्कि दस्तावेजों और आंकड़ों पर आधारित है। 10,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा यूं ही हवा में नहीं उछाला जा सकता। यह रकम उस देश में है जहां किसान कर्ज़ में आत्महत्या करता है, युवा बेरोज़गारी से जूझता है और मध्यम वर्ग हर साल नए टैक्स के बोझ तले दबता जा रहा है। ऐसे में अगर बड़े कॉरपोरेट समूह आपसी सौदों के जरिए मुनाफा सुरक्षित करें और जोखिम दूसरों पर डालें, तो सवाल उठना जरूरी है।
READ MORE: बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत से सजेगी गणतंत्र दिवस की शोभायात्रा
कट्टरपंथियों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि उनका नैतिक कम्पास चयनात्मक है। उन्हें भ्रष्टाचार तब दिखता है जब वह उनके विचारधारा-विरोधी खेमे में हो। उन्हें घोटाला तब लगता है जब आरोपी उनका दुश्मन हो। लेकिन जब आरोप उनके पसंदीदा, ताकतवर या “सिस्टम के जरूरी स्तंभ” माने जाने वालों पर लगे, तब वही लोग चुप्पी साध लेते हैं या फिर आरोप लगाने वाले को ही देशद्रोही, एजेंडा-ड्रिवन और विदेशी ताकतों का एजेंट बता देते हैं।
READ MORE: सरल कानून और विश्वास आधारित प्रशासन देश के विकास की कुंजी, केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण
यह स्क्रिप्ट किसी एक ग्रुप या व्यक्ति के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए नहीं है, बल्कि उस दोगलेपन को उजागर करने के लिए है जो आज की सार्वजनिक बहस में गहराई तक बैठ चुका है। अगर 10,000 करोड़ के रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शन पर सवाल उठाना राष्ट्रविरोधी है, तो फिर राष्ट्रभक्ति का मतलब क्या सिर्फ़ पोस्टर, नारे और टीवी डिबेट तक सीमित रह गया है? असली राष्ट्रभक्ति शायद यही है कि ताकतवर से सवाल पूछे जाएं, चाहे वह कितना ही बड़ा उद्योग समूह क्यों न हो, और चाहे उससे जुड़े नाम कितने ही सम्मानित क्यों न माने जाते हों।
Follow Us: YouTube| Tv today Bharat Live | Breaking Hindi News Live | Website: Tv Today Bharat| X | FaceBook | Quora| Linkedin | tumblr | whatsapp Channel | Telegram
