PM Modi exam stress advice: भारत में जैसे एक परीक्षा का सीज़न आता है, लाखों घरों में एक जैसी चिंता फैल जाती है। माता-पिता की विशिष्टता, स्कूल का सम्राट और समाज की तुलना ये सभी सामूहिक बच्चों के मन पर भारी दबाव डालते हैं। इसी संदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षा व्यवस्था से लेकर एक अहम संदेश दिया है, जो केवल छात्रों के लिए नहीं, बल्कि ढांचे, ढांचे और पूरे समाज के लिए विचार का विषय है। प्रधानमंत्री ने साफा से कहा कि शिक्षा में धैर्य और संतुलन की आवश्यकता है, न कि केवल अंक और स्तर की दौड़।
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प्रधानमंत्री मोदी का स्पष्ट संदेश
प्रधानमंत्री मोदी ने परीक्षा के दौरान बच्चों पर अत्यधिक अकादमिक दबाव डालने को लेकर चिंता पहुंचाई। उन्होंने केंद्रीय राज्य मंत्री जयंत चौधरी द्वारा लिखे गए लेख को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा करते हुए कहा किंक और मूल्यांकन मार्गदर्शन हैं, मंजिल नहीं। प्रधानमंत्री का यह बयान केवल एक विचार नहीं, बल्कि समकालीन शिक्षा संस्कृति पर सीधा प्रश्न है क्या हम बच्चों को सीखने का अवसर दे रहे हैं या केवल परिणामों की मशीन बना रहे हैं?
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शिक्षा को लेकर नई सोच
जयन्त चौधरी ने अपने लेख दबाव पर धैर्य: माता-पिता के लिए एक संकल्प में शिक्षा के उस मॉडल पर सवाल उठाया है, जिसमें शुरुआती उम्र से ही बच्चों पर “टॉपर बनने” का बोझ डाला जाता है। उनका कहना है कि हर बच्चे का विकास एक-सा नहीं होता और सीखने की कोई तय समय-सीमा नहीं होती। उनका मानना है कि जिज्ञासा, और प्रयोग का अनुभव ये सभी सीखने की बुनियाद हैं, न कि केवल प्रारंभिक विशेषज्ञ बन जाना।
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क्या शुरुआती सफलता ही भविष्य की गारंटी है?
लेख में यह भी बताया गया है कि कई अंतरराष्ट्रीय शोध इस बात की पुष्टि करते हैं कि शुरुआत में पके लंबे समय की सफलता की गारंटी नहीं होती। खेल, विज्ञान और कला हर क्षेत्र में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां लोग अलग-अलग क्षेत्रों को छोड़ते हुए धीरे-धीरे अपनी वास्तविक प्रतिभा तक वर्णन करते हैं। यह सोच उस मानसिकता को चुनौती देती है जिसमें बच्चों को कम उम्र में ही करियर का फैसला करने के लिए मजबूर किया जाता है।
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NEP 2020 और बहुआयामी शिक्षा की अवधारणा
जयंत चौधरी ने अपने लेख में भारत की नई शिक्षा नीति का भी उल्लेख किया है, जो बहुविषयक शिक्षा, आवश्यकताओं और योग्यताओं की स्वतंत्रता को बढ़ावा देती है। नीति का उद्देश्य यह है कि बच्चा केवल एक विषय तक सीमित न रहे, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों को समझें, परखे और फिर अपने लिए सही रास्ता चुनें। लेकिन नीति तभी सफल होगी जब परिवार और स्कूल मिलकर इस सोच को अपनाएं।
तुलना नहीं, समझ जरूरी
इस पूरी बहस में सबसे अहम भूमिका माता-पिता की है। अक्सर देखा जाता है कि बच्चों की तुलना पड़ोसी, रिश्तेदार या सोशल मीडिया के सफल बच्चों से की जाती है। यह तुलना धीरे-धीरे आत्मविश्वास को खत्म कर देती है। प्रधानमंत्री मोदी और जयंत चौधरी दोनों ही इस बात पर जोर देते हैं कि बच्चे को सुनना, समझना और समय देना यही सच्ची परवरिश है।
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परीक्षाएं जरूरी हैं, लेकिन अंतिम फैसला नहीं
लेख का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि, परीक्षाएं जरूरी हैं, लेकिन वे बच्चे की पूरी क्षमता का फैसला नहीं कर सकतीं। अंक केवल यह बताते हैं कि बच्चा उस समय क्या समझ पाया, न कि वह जीवन में क्या बन सकता है। यदि परीक्षाओं को माइलस्टोन की तरह देखा जाए, न कि डेस्टिनेशन, तो शिक्षा बोझ नहीं, अवसर बन सकता है।
शिक्षकों और स्कूलों के लिए भी आत्ममंथन
लेख का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि, परीक्षाएं जरूरी हैं, लेकिन वे बच्चे की पूरी क्षमता का फैसला नहीं कर सकतीं। अंक केवल यह बताते हैं कि बच्चा उस समय क्या समझ पाया, न कि वह जीवन में क्या बन सकता है। यदि परीक्षाओं को माइलस्टोन की तरह देखा जाए, न कि डेस्टिनेशन, तो शिक्षा बोझ नहीं, अवसर बन सकती है।
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समाज को बदलनी होगी सफलता की परिभाषा
आज समाज में सफलता को बहुत संकीर्ण रूप में देखा जाता है अच्छे अंक, प्रतिष्ठित कॉलेज और ऊंची नौकरी। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी का संदेश इससे कहीं आगे जाता है। सफलता का मतलब है आत्मविश्वासी, संतुलित और संवेदनशील नागरिक तैयार करना, न कि केवल मार्कशीट के आंकड़े।
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अंकों से आगे इंसान देखिए
जयंत चौधरी अपने लेख के अंत में एक सामूहिक अपील करते हैं। माता पिता, शिक्षक, शिक्षाविद और नीति-निर्माता मिलकर ऐसा माहौल बनाएं जहां । महत्वाकांक्षा के साथ धैर्य भी हो। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा इस लेख का समर्थन यह संकेत देता है कि, भारत की शिक्षा दिशा अब केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि समझ, संतुलन और संवेदना की ओर बढ़ रही है। क्योंकि हर बच्चा अलग है और हर प्रतिभा को खिलने के लिए समय चाहिए।
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