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जुर्मराष्ट्रीय

Unnao Rape Case Update: सुप्रीम कोर्ट का सख़्त संदेश, कुलदीप सेंगर को बड़ा झटका, जेल में ही कटेंगी सर्द रातें !

उन्नाव रेप केस में दोषी कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सजा निलंबन के फैसले पर रोक लगा दी है।

Last updated: December 29, 2025 3:13 pm
KARTIK SHARMA - Sub Editor Published December 29, 2025
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Unnao rape case Supreme Court stay – image showing Kuldeep Singh Sengar, Supreme Court of India building, CBI reference and justice theme highlighting stay on sentence suspension
उन्नाव रेप केस में सुप्रीम कोर्ट ने सख़्त रुख अपनाते हुए कुलदीप सिंह सेंगर को राहत देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी। नाबालिग पीड़िता के मामले में न्याय की कसौटी और कठोर होती दिखी।CROME TEAM
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Highlights
  • उन्नाव रेप केस में सुप्रीम कोर्ट का सख़्त रुख
  • दिल्ली हाईकोर्ट के सजा निलंबन आदेश पर क्यों लगी रोक
  • कुलदीप सिंह सेंगर और लोक सेवक की कानूनी बहस
  • नाबालिग पीड़िता, पॉक्सो कानून और CBI की दलील
  • न्याय व्यवस्था के लिए यह फैसला क्यों है अहम

Unnao Rape Case Supreme Court Stay: उन्नाव रेप केस एक बार फिर देश की न्यायिक और नैतिक चेतना के केंद्र में है। दोषी पूर्व विधायक Kuldeep Singh Sengar को लेकर Supreme Court of India का ताज़ा आदेश न सिर्फ़ कानूनी बहसों को नई दिशा देता है, बल्कि यह भी साफ़ करता है कि नाबालिग पीड़िता के मामलों में अदालतें किसी तरह की ढिलाई के पक्ष में नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने Delhi High Court के उस फैसले पर रोक लगा दी है, जिसमें सेंगर की सजा निलंबित की गई थी। यह आदेश सेंगर के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

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मामला क्या है और विवाद कहां से शुरू हुआ?

2017 के उन्नाव रेप केस में सेंगर को दोषी ठहराया गया था। दिसंबर 2019 में निचली अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने यह कहते हुए सजा निलंबित कर दी कि सेंगर सात साल से अधिक समय जेल में काट चुका है। हालांकि, इस निलंबन के बावजूद वह जेल से बाहर नहीं आया, क्योंकि पीड़िता के पिता की हत्या के मामले में वह अलग से उम्रकैद की सजा काट रहा है। दिल्ली हाईकोर्ट के इसी आदेश को Central Bureau of Investigation (CBI) ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। CBI की मुख्य आपत्ति यह थी कि हाईकोर्ट ने अपराध के समय विधायक रहे सेंगर को लोक सेवक नहीं माना जो कानून की नजरिये से गंभीर त्रुटि है।

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ—जिसका नेतृत्व न्यायमूर्ति Justice Surya Kant कर रहे थे ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर तत्काल रोक लगा दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल आदेश पर रोक लगाना जरूरी है और “लोक सेवक” की परिभाषा जैसे प्रश्नों पर विस्तृत विचार बाद में किया जाएगा। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि सामान्य सिद्धांत के तहत सजा निलंबन के मामलों में अदालतें व्यक्ति की स्वतंत्रता को ध्यान में रखती हैं, लेकिन यहां परिस्थिति विशिष्ट है, क्योंकि आरोपी एक अन्य मामले में पहले से ही जेल में है और अपराध नाबालिग से जुड़ा है।

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CBI और सॉलिसिटर जनरल की दलील

CBI की ओर से सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने जोरदार दलील रखी। उन्होंने कहा कि पीड़िता की उम्र घटना के समय मात्र 15 साल 10 महीने थी यानी वह स्पष्ट रूप से नाबालिग थी। ऐसे में IPC की धारा 376 और POCSO एक्ट की धारा 5 लागू होती है। इन धाराओं के तहत अपराध की गंभीरता और आरोपी की “प्रभुत्वशाली स्थिति” को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। एसजी ने यह भी रेखांकित किया कि धारा 376(2)(i) के तहत यदि अपराध किसी प्रभावशाली या सत्ता में बैठे व्यक्ति द्वारा किया गया हो, तो न्यूनतम सजा 20 साल की कैद है, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है। उनका तर्क था कि हाईकोर्ट ने इन कानूनी पहलुओं पर समुचित विचार नहीं किया।

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लोक सेवक की बहस क्यों अहम है?

CBI की आपत्ति का केंद्र यही था कि सेंगर अपराध के समय एक निर्वाचित विधायक था और इसलिए उसे लोक सेवक माना जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने यह मानने से इनकार किया, जिसे CBI ने गलत ठहराया। सुप्रीम कोर्ट ने इस बिंदु पर अंतिम राय सुरक्षित रखते हुए संकेत दिया कि यह प्रश्न व्यापक व्याख्या की मांग करता है खासतौर पर तब, जब अपराध सत्ता के दुरुपयोग से जुड़ा हो।

सड़क से अदालत तक विरोध

दिल्ली हाईकोर्ट के सजा निलंबन के आदेश के बाद से ही देशभर में विरोध शुरू हो गया था। फैसले के दिन ही पीड़िता, उसकी मां और सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना धरने पर बैठ गईं। सुप्रीम कोर्ट के बाहर भी प्रदर्शन हुए, भारी पुलिस बल तैनात रहा। प्रदर्शनकारियों की मांग साफ़ थी कुलदीप सेंगर को किसी भी सूरत में रिहा न किया जाए।

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न्याय प्रणाली पर भरोसा लेकिन सतर्कता भी

सेंगर के वकील शशि त्रिपाठी ने हाईकोर्ट में कहा था कि न्याय प्रणाली पर भरोसा रखा जाना चाहिए। यह बात अपनी जगह सही है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा रुख यह बताता है कि नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों में अदालतें तकनीकी राहत देने से पहले सौ बार सोचेंगी।

बड़ा संदेश क्या है?

यह फैसला सिर्फ़ एक आरोपी तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि,

  • नाबालिग पीड़ितों के मामलों में कानून की सख़्ती से व्याख्या होगी
  • सत्ता में रहे व्यक्तियों के लिए लोक सेवक की जिम्मेदारी से बच निकलना आसान नहीं होगा
  • समाजिक दबाव और पीड़ित की सुरक्षा को न्यायिक प्रक्रिया से अलग नहीं देखा जाएगा

उन्नाव रेप केस में सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप बताता है कि न्याय सिर्फ़ फ़ैसलों से नहीं, बल्कि उनके समय और संदर्भ से भी तय होता है। और फिलहाल, यह समय पीड़िता के पक्ष में न्याय को मज़बूती से खड़ा करने का है।

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