Vande Mataram Debate TMC: संसद के अंदर Vande Mataram Debate आज सिर्फ एक राजनीतिक चर्चा नहीं रही, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, आज़ादी की भावना और साहित्यिक विरासत का भी एक जीवंत प्रतीक बन गई। 150 वर्ष पूरे होने पर जब पूरे देश में वंदे मातरम के महत्व को लेकर बहस तेज़ हुई, उसी दौरान तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसदों ने संसद भवन में रवीन्द्रनाथ टैगोर और बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की तस्वीरें पकड़कर एक अलग ही संदेश दिया। यह दृश्य न केवल राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना, बल्कि इसने उन दो महान साहित्यकारों को याद करने का अवसर भी दिया, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद को अपनी लेखनी से जीवंत बनाया।
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TMC MPs stand with Tagore और Bankim Chandra Chatterjee’s photos in Parliament वाली यह तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुईं। TMC सांसदों का कहना है कि वंदे मातरम को किसी राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने के बजाय इसे सांस्कृतिक धरोहर और राष्ट्रभक्ति के प्रतीक के रूप में सम्मान दिया जाना चाहिए। उनका रुख साफ था—वंदे मातरम न तो किसी एक विचारधारा का गीत है और न ही किसी दल की संपत्ति। यह भारत के उस साहित्यिक और आध्यात्मिक वैभव की पहचान है, जिसे बंकिम चंद्र ने रचा और जिसकी रक्षा और सम्मान के लिए रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पूरी दुनिया में भारतीय संस्कृति का गौरव बढ़ाया।
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यह पहली बार नहीं है जब संसद में किसी सांस्कृतिक विषय पर राजनीतिक रंग दिखाई दिया हो, लेकिन Vande Mataram Debate इस बार अधिक गहरी भावना से जुड़ी दिखी। 150 वर्षों की यात्रा में वंदे मातरम सिर्फ कागज़ पर लिखे शब्द नहीं रहे, बल्कि यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम की धड़कन बन गया। जब-जब इस गीत की आवाज़ गूंजी, तब-तब क्रांतिकारियों के अंदर ऊर्जा और मातृभूमि के लिए समर्पण की भावना जाग उठी। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए TMC ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वंदे मातरम का सम्मान सबसे ऊपर है—और इसे किसी भी विभाजनकारी राजनीति के माध्यम से बांटा नहीं जा सकता।
संसद के भीतर आज जो बहस चल रही है, वह केवल इतिहास की समीक्षा नहीं, बल्कि आज और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मूल्य आधारित संदेश भी है। वंदे मातरम का विरोध या समर्थन राजनीतिक आधार पर नहीं होना चाहिए, बल्कि यह समझना होगा कि इस गीत ने भारत की पहचान को कैसे मजबूत किया। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने जब यह रचना लिखी थी, तब उनका उद्देश्य किसी भी प्रकार का धार्मिक या राजनीतिक मतभेद बढ़ाना नहीं था। उनका मकसद सिर्फ मातृभूमि की महिमा का गुणगान था। बाद में टैगोर ने भी इसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए साहित्य, गीत और कला के माध्यम से भारत को विश्व मंच पर एक सांस्कृतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।
TMC MPs stand with Tagore वाली यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज के समय में देश का राजनीतिक वातावरण अक्सर भावनात्मक मुद्दों और ऐतिहासिक प्रतीकों को लेकर संवेदनशील हो जाता है। ऐसे में TMC का कदम एक संतुलित और साहित्यिक दृष्टिकोण को सामने लाता है। वे यह दर्शाना चाहते हैं कि बंकिम चंद्र और टैगोर जैसे महान रचनाकारों का सम्मान किसी दल की सीमा से परे है। वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता का प्रतीक है और इसका सम्मान हर भारतीय का दायित्व है।
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Vande Mataram Debate ने इतिहास को फिर से जीवंत कर दिया है। यह बहस याद दिलाती है कि राष्ट्रभक्ति का अर्थ किसी एक विचारधारा का अनुसरण करना नहीं, बल्कि देश की विरासत, संस्कृति और पूर्वजों द्वारा दिए गए आदर्शों का सम्मान करना है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना और टैगोर की विचारधारा इस राष्ट्र की आत्मा हैं। इसलिए संसद में उनका चित्र पकड़े खड़े TMC सांसद न सिर्फ एक राजनीतिक संदेश दे रहे थे, बल्कि भारत की उस सांस्कृतिक आत्मा का भी स्मरण कर रहे थे, जो सदियों से इस देश को जोड़ती आई है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ पर छिड़ी यह बहस हमें एक बार फिर याद दिलाती है भारत की पहचान उसकी विविधता, उसकी संस्कृति और उसके महान साहित्यकारों की लेखनी में बसती है। राजनीति बदलती रहती है, पर राष्ट्रगीत की भावना अमर रहती है।
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