Vande Mataram controversy: देश की राजनीति में ऐसे मुद्दे अक्सर आते हैं जो सिर्फ़ संसद की चार दीवारों में नहीं रुकते… भावनाओं, विचारों और पहचान की बहस बन जाते हैं। वंदे मातरम आज उसी मोड़ पर खड़ा है। 8 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सदन में जैसे ही वंदे मातरम् पर बात शुरू की, विपक्ष की सीटों पर हलचल बढ़ गई… और ये मुद्दा तुरंत राष्ट्रीय बहस में बदल गया। सवाल ये नहीं कि वंदे मातरम् क्या है… सवाल ये है कि इसका अर्थ कैसे समझा जा रहा है, किस नज़र से देखा जा रहा है, और क्यों आज यह फिर से राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का केंद्र बन गया है।

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सदन में टकराव, बाहर तेज़ होती आवाज़ें
पीएम मोदी के बयान के बाद विपक्ष ने भी कोई कमी नहीं छोड़ी। प्रियंका गांधी का भाषण सोशल मीडिया पर वायरल हो गया तेज़, तंज भरा और सीधा। उन्होंने सरकार पर निशाना साधा और कहा कि राष्ट्रगौरव के नाम पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। उनके भाषण ने विपक्ष को नई ऊर्जा दी और मुद्दा और गरम हो गया। लेकिन चर्चा यहीं नहीं रुकी… संसद से निकलकर बहस सीधे जनता की गलियों तक आ गई। टीवी डिबेट्स से लेकर सोशल मीडिया स्पेस तक हर जगह एक ही सवाल गूंज रहा है: क्या वंदे मातरम् सिर्फ़ एक गीत है या राष्ट्रभावना का प्रतीक?
अरशद मदनी भी उतरे मैदान में एक लंबी पोस्ट के साथ
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अरशद गुट के अध्यक्ष अरशद मदनी भी इस बहस में उतर आए। उन्होंने X पर एक लंबा लेख लिखते हुए वंदे मातरम् का अर्थ और उसकी व्याख्या पर अपनी टिप्पणी दी। मदनी ने कहा कि वंदे मातरम् का मूल संदर्भ मातृभूमि की वंदना है भूमि के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति। लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि धार्मिक व्याख्याओं को लेकर मुस्लिम समाज में इस गीत पर ऐतिहासिक आपत्तियां रही हैं। उनकी पोस्ट ने बहस को एक नया मोड़ दिया अब मामला सिर्फ़ राजनीति या संसद का नहीं था, बल्कि व्याख्या बनाम भावना का हो गया।
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जनता में दो राय, एक गीत, कई अर्थ
एक तरफ़ लोग हैं जो वंदे मातरम् को राष्ट्र की आत्मा का गीत मानते हैं। दूसरी तरफ़ वे लोग जो कहते हैं कि किसी भी राष्ट्रगीत या राष्ट्रीय प्रतीक पर सहमति जरूरी है, थोपना नहीं। बहस का असल केंद्र यही है, गीत को कैसे समझा जाए? शब्दों में क्या निहित है? और क्या राष्ट्र की एकता समान भाव से ही possible है?
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क्यों लौट आया वंदे मातरम् राष्ट्र की राजनीति में?
देश चुनावी मौसम में है, राजनीतिक तापमान तेज़ है। ऐसे में वंदे मातरम् जैसे प्रतीक स्वाभाविक रूप से चर्चा में आते हैं। लेकिन इस बार फर्क यह है कि बहस सिर्फ़ राजनीतिक नहीं है…यह सांस्कृतिक, सामाजिक और वैचारिक तीनों स्तरों पर फैल चुकी है। और यही इसे बड़ा, तेज़ और बेहद संवेदनशील बना देता है।
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