Zohran Mamdani on Umar Khalid: हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भी अगर कोई भारतीय राजनीति की नब्ज़ पर उंगली रखने का दावा करे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—नियत पर, समझ पर और सबसे ज़्यादा प्राथमिकताओं पर। न्यूयॉर्क के मेयर बनते ही जो पहला वैचारिक हस्तक्षेप सामने आता है, वह अगर भारत की जेलों में बंद एक आरोपी को लेकर हो, तो यह सिर्फ़ संवेदना नहीं, एक सोची-समझी राजनीतिक मुद्रा है। Zohran Mamdani का तिहाड़ जेल में बंद Umar Khalid को लेकर सार्वजनिक रूप से सोचना महज़ मानवीय चिंता नहीं दिखता यह एक चुनी हुई कथा है, जो दूर बैठकर भी क़ौम की राजनीति को हवा देने का प्रयास करती है।
READ MORE: भारत की रेल क्रांति में एक और बड़ा कदम, वंदे भारत स्लीपर ट्रेन तैयार, गुवाहाटी–कोलकाता होगा पहला रूट
यह अजीब विडंबना है कि जिस भारत में लोकतंत्र की संस्थाएं न्यायपालिका, जांच एजेंसियां, और संवैधानिक प्रक्रियाएं अपने-अपने दायरे में काम कर रही हैं, वहां किसी दूसरे देश के निर्वाचित मेयर को अचानक न्याय और अभिव्यक्ति की चिंता सताने लगे। क्या यह चिंता सर्वसमावेशी है? क्या यह चिंता उन असंख्य पीड़ितों के लिए भी है, जो हिंसा, दंगों और उकसावे की राजनीति का शिकार हुए? या फिर यह चिंता चुनिंदा नामों तक सीमित है उन चेहरों तक, जिन्हें वैश्विक वाम-उदार विमर्श ने प्रतीक बना दिया है?
READ MORE: केंद्र ने केरल, पटना और मेघालय हाईकोर्ट के नए मुख्य न्यायाधीशों को दी मंजूरी
यह भी सवाल है कि Tihar Jail का नाम लेते ही भावनाएं क्यों उबाल मारने लगती हैं, जबकि उसी भारत में सैकड़ों मामले ऐसे हैं जिनमें पीड़ित वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। क्या न्यूयॉर्क के मेयर को उन परिवारों की भी सुध है, जिनके घर दंगों में जले, जिनकी दुकानें राख हुईं, जिनकी रोज़ी-रोटी छिन गई? या फिर यह “सोच” केवल वैचारिक समानता तक सीमित है जहां आरोपी का विचार, उसका नेटवर्क और उसका नैरेटिव पहले से तय कर दिया जाता है?
और यह सब तब, जब भारत के भीतर ही एक दूसरी तस्वीर उभर रही हैहिंदू समाज आपस में बंटा हुआ, जाति, वर्ग और क्षेत्रीय पहचान के खांचों में उलझा हुआ। यही वह क्षण है, जब बाहरी हस्तक्षेप सबसे सहज हो जाता है। जब समाज खुद अपने भीतर लड़ रहा हो, तब दूर बैठकर नैरेटिव थोपना आसान होता है। जोहरान ममदानी का बयान इसी खाली जगह को भरने की कोशिश जैसा लगता है जहां भारत की जटिल वास्तविकताओं को एक पंक्ति में समेट दिया जाता है, और न्याय को पोस्टर बना दिया जाता है।
यहां कटाक्ष इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि सवाल संवेदना का नहीं, चयन का है। अगर मेयर साहब को सचमुच लोकतंत्र और मानवाधिकारों की फिक्र है, तो क्या वे अपने शहर में बढ़ती अपराध दर, नस्ली तनाव, आवास संकट और बेघर लोगों की समस्या पर उतनी ही मुखरता दिखाएंगे? या फिर भारत पर टिप्पणी करना अपेक्षाकृत सुरक्षित है क्योंकि इससे वैश्विक मीडिया में तालियां मिलती हैं, और एक प्रोग्रेसिव छवि गढ़ी जाती है? दरसल, यह पूरा प्रसंग एक शीशे की तरह है जिसमें देखने वाला अपने पसंद का प्रतिबिंब चुन लेता है। जोहरान ममदानी इस शीशे में अभिव्यक्ति की आज़ादी देखते हैं, उनके समर्थक अल्पसंख्यक अधिकार, और उनके आलोचक चयनित आक्रोश। लेकिन शीशे के पीछे जो ठोस सच है, वह यह कि भारत कोई प्रयोगशाला नहीं, जहां दूर बैठे नेता नैरेटिव टेस्ट करें। यहां कानून चलता है, अदालतें फैसले देती हैं, और हर आरोपी चाहे वह किसी भी विचारधारा का हो कानून के दायरे में ही परखा जाता है।
READ MORE: पीएम मोदी ने की सुरेश कुमार की बेंगलुरु–कन्याकुमारी साइकिल यात्रा की सराहना
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हजारों किलोमीटर की दूरी भी क़ौम की राजनीति के रास्ते में बाधा नहीं बनती? या फिर यह दूरी ही वह सुविधा है, जो ज़मीनी सच्चाइयों से कटे हुए बयान देने की छूट देती है? जब भारत में हिंदू समाज अपनी आंतरिक चुनौतियों से जूझ रहा हो, तब ऐसे बयान आग में घी का काम करते हैं और यही शायद उनकी उपयोगिता भी है। यह बहस किसी एक नाम तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह उस प्रवृत्ति पर सवाल है, जहां वैश्विक मंचों पर बैठे लोग भारत को एक फ्रेम में कैद करना चाहते हैं कभी असहिष्णु, कभी दमनकारी, कभी विभाजित। जबकि सच यह है कि भारत बहस करता है, टकराता है, पर फैसला अपने संविधान से करता है। जोहरान ममदानी का सोचना अगर इसी समझ के साथ हो, तो स्वागत है। लेकिन अगर यह सोचना सिर्फ़ वैचारिक झंडा गाड़ने के लिए है, तो यह भारत नहीं खुद उनके राजनीतिक विवेक पर सवाल खड़े करता है।
Follow Us: YouTube| TV TODAY BHARAT LIVE | Breaking Hindi News Live | Website: Tv Today Bharat| X | FaceBook | Quora| Linkedin | tumblr | whatsapp Channel | Telegram
