H5N1 virus AI model research: भारतीय वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में एक बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने एक उन्नत एआई मॉडल की मदद से यह समझने और समझाने में सफलता पाई है कि खतरनाक एच5एन1 वायरस यानी बर्ड फ्लू इंसानों के शरीर पर किस तरह “अटैक” करता है। यह शोध न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि एच5एन1 को भविष्य की संभावित महामारी के सबसे बड़े खतरों में गिना जाता है। अब तक वैज्ञानिक यह तो जानते थे कि यह वायरस जानवरों और पक्षियों से इंसानों में फैल सकता है, लेकिन यह इंसानी कोशिकाओं में कैसे प्रवेश करता है, वहां कैसे खुद को मजबूत बनाता है और किस तरह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को चकमा देता है इस पर तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं थी।
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भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित एआई मॉडल ने इसी जटिल पहेली को सुलझाने में मदद की है। इस मॉडल को हजारों जैविक डेटा सेट, वायरस के जीनोमिक स्ट्रक्चर और इंसानी कोशिकाओं की जानकारी से प्रशिक्षित किया गया। एआई ने बेहद कम समय में उन पैटर्न्स को पहचान लिया, जिन्हें पारंपरिक रिसर्च में समझने में सालों लग जाते हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, एआई मॉडल ने यह दिखाया कि एच5एन1 वायरस इंसानी श्वसन तंत्र की कोशिकाओं में मौजूद कुछ खास प्रोटीन रिसेप्टर्स को निशाना बनाता है। जैसे ही वायरस इन रिसेप्टर्स से जुड़ता है, वह कोशिका के अंदर प्रवेश कर जाता है और वहां अपनी प्रतिकृति बनाना शुरू कर देता है।
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इस रिसर्च की सबसे अहम बात यह है कि एआई मॉडल ने वायरस के म्यूटेशन पैटर्न को भी समझाया है। एच5एन1 लगातार अपना स्वरूप बदलता रहता है, जिससे वैक्सीन और दवाइयों को विकसित करना मुश्किल हो जाता है। एआई ने यह बताया कि किन परिस्थितियों में वायरस ज्यादा खतरनाक रूप ले सकता है और कौन से म्यूटेशन इंसानों के लिए सबसे ज्यादा जोखिम भरे हो सकते हैं। इससे भविष्य में समय रहते चेतावनी प्रणाली विकसित की जा सकती है, ताकि किसी भी संभावित प्रकोप को शुरुआती चरण में ही रोका जा सके।
भारतीय वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि यह एआई मॉडल केवल एच5एन1 तक सीमित नहीं है। इसे अन्य वायरस और संक्रामक रोगों पर भी लागू किया जा सकता है। कोविड-19 के बाद दुनिया ने यह समझ लिया है कि महामारी से लड़ने के लिए तेज, सटीक और डेटा-आधारित समाधान कितने जरूरी हैं। इस एआई मॉडल की मदद से यह पहले ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कोई वायरस इंसानों के लिए कितना खतरनाक हो सकता है और उसके फैलने की गति क्या होगी। इससे स्वास्थ्य नीति बनाने वालों और सरकारों को सही समय पर सही फैसले लेने में मदद मिलेगी।
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इस उपलब्धि से भारत की वैज्ञानिक क्षमता और मजबूत हुई है। यह दिखाता है कि भारत अब केवल डेटा कंज्यूमर नहीं, बल्कि अत्याधुनिक एआई और बायोमेडिकल रिसर्च में इनोवेशन लीडर के रूप में उभर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस तरह के एआई मॉडल्स को वैश्विक स्तर पर अपनाया जाए, तो भविष्य की महामारियों से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। खास बात यह भी है कि इस रिसर्च में लागत और समय दोनों की बचत हुई है, क्योंकि एआई ने प्रयोगशाला के कई जटिल चरणों को वर्चुअल रूप से पूरा कर लिया।
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स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, एच5एन1 अभी आम तौर पर इंसानों में सीमित मामलों में ही पाया जाता है, लेकिन अगर इसमें इंसान से इंसान में तेजी से फैलने की क्षमता आ गई, तो यह गंभीर संकट पैदा कर सकता है। ऐसे में भारतीय वैज्ञानिकों की यह खोज एक तरह की “अर्ली वार्निंग सिस्टम” की तरह काम कर सकती है। यह रिसर्च यह भी संकेत देती है कि भविष्य की दवाइयों और वैक्सीन को डिजाइन करते समय किन बिंदुओं पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
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कुल मिलाकर, एआई मॉडल के जरिए एच5एन1 वायरस के इंसानों पर अटैक को समझना भारतीय विज्ञान के लिए एक बड़ी छलांग है। यह न केवल चिकित्सा और स्वास्थ्य क्षेत्र में क्रांति ला सकता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और जैव विज्ञान का मेल भविष्य की सबसे बड़ी चुनौतियों से निपटने की कुंजी बन सकता है। भारत की यह उपलब्धि आने वाले समय में वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकती है और यही कारण है कि इसे विज्ञान की दुनिया में एक मील का पत्थर माना जा रहा है।
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