CDS Anil Chauhan: उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले स्थित हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के चौरास परिसर में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में देश के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) Anil Chauhan ने विद्यार्थियों के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर विस्तृत संवाद किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं, शोधार्थी और प्राध्यापक उपस्थित रहे। अपने संबोधन में सीडीएस ने प्राचीन भारतीय सामरिक परंपराओं से लेकर वर्तमान वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य तक के विभिन्न आयामों को सरल और स्पष्ट भाषा में समझाया।
राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सेना की जिम्मेदारी नहीं
CDS Anil Chauhan ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा को केवल सैन्य ताकत तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। यह एक व्यापक अवधारणा है, जिसमें समाज के हर वर्ग की भूमिका होती है। उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा उसकी कूटनीति, आर्थिक स्थिरता, तकनीकी क्षमता और सामाजिक एकता पर समान रूप से निर्भर करती है। यदि समाज सजग और आत्मनिर्भर है, तो वह बाहरी और आंतरिक चुनौतियों का बेहतर सामना कर सकता है।
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उन्होंने इस धारणा को भी खारिज किया कि भारत में सामरिक चिंतन की परंपरा कमजोर रही है। उनके अनुसार, भारतीय इतिहास में रणनीतिक सोच की जड़ें अत्यंत गहरी रही हैं।
प्राचीन ग्रंथों में समृद्ध सामरिक परंपरा
अपने संबोधन में CDS Anil Chauhan ने भारतीय परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि पौराणिक काल से ही यहां युद्धकला और रणनीति पर गंभीर चिंतन होता रहा है। उन्होंने धनुर्वेद का उदाहरण देते हुए बताया कि उसमें व्यूह रचना, शस्त्र संचालन और सेना प्रबंधन का विस्तृत वर्णन मिलता है।
इसी तरह अर्थशास्त्र और चाणक्य नीति में राज्य सुरक्षा, शक्ति संतुलन और कूटनीतिक कौशल की स्पष्ट व्याख्या की गई है। उन्होंने कहा कि आचार्य चाणक्य की रणनीतिक दृष्टि आज भी भारत की विदेश नीति और राष्ट्रीय सोच में दिखाई देती है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत की सामरिक सोच किसी भी रूप में कमजोर नहीं रही, बल्कि समय-समय पर परिस्थितियों के अनुसार विकसित होती रही है।
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मौलिक सोच की आवश्यकता पर जोर
इतिहास के संदर्भ में बोलते हुए उन्होंने कहा कि लंबे समय तक विदेशी शासन के कारण भारत की सामरिक दृष्टि पर असर पड़ा। हालांकि 1947 में देश को राजनीतिक स्वतंत्रता मिल गई, लेकिन मानसिक और रणनीतिक आत्मविश्वास को पुनर्स्थापित करने में समय लगा।

उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे मौलिक और स्वदेशी सोच विकसित करें। केवल पश्चिमी सिद्धांतों और रणनीतियों की नकल कर लेने से दीर्घकालीन सफलता संभव नहीं है। यदि हथियारों के निर्माण से लेकर युद्धनीति और रणनीति तक हर क्षेत्र में मौलिकता होगी, तभी निर्णायक बढ़त हासिल की जा सकती है।
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राष्ट्रीय सुरक्षा के तीन प्रमुख घेरे
CDS Anil Chauhan ने राष्ट्रीय सुरक्षा की संरचना को तीन प्रमुख घेरों में समझाया-
- पहला बाहरी घेरा दीर्घकालीन रणनीतिक आकलन से जुड़ा है। इसमें कूटनीति, आर्थिक शक्ति और तकनीकी प्रगति शामिल हैं। किसी भी राष्ट्र को वैश्विक स्तर पर मजबूत स्थिति बनाए रखने के लिए इन क्षेत्रों में सुदृढ़ होना आवश्यक है।
- दूसरा मध्य घेरा देश की रक्षा व्यवस्था से संबंधित है, जिसमें थल, जल और वायु सेनाओं की भूमिका प्रमुख होती है।
- तीसरा आंतरिक घेरा आत्मनिर्भरता, सैन्य संरचना की मजबूती और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर केंद्रित है। उन्होंने कहा कि यदि ये तीनों घेरे संतुलित और सशक्त हों, तो राष्ट्र की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत आधार पर खड़ी रहती है।
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बदलता युद्ध स्वरूप और नई चुनौतियां
अपने व्याख्यान में CDS Anil Chauhan ने आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज पारंपरिक युद्धों के साथ-साथ साइबर हमले, सूचना युद्ध और खुफिया तंत्र की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गई है। तकनीक के बढ़ते उपयोग ने युद्ध की परिभाषा को व्यापक बना दिया है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत के सामने परमाणु क्षमता से लैस पड़ोसी देशों की चुनौती मौजूद है। परमाणु संतुलन के कारण बड़े और लंबे युद्ध की संभावना कम हो सकती है, लेकिन सीमित संघर्ष, आतंकवाद और सीमा विवाद जैसी समस्याएं अब भी गंभीर हैं। ऐसे में देश को दीर्घकालीन तैयारी के साथ-साथ त्वरित और सटीक रणनीति पर भी ध्यान देना होगा।
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छात्रों के साथ खुला संवाद
कार्यक्रम के अंत में CDS Anil Chauhan ने विद्यार्थियों के प्रश्नों का जवाब देते हुए उन्हें रणनीतिक सोच विकसित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा केवल सीमाओं पर तैनात सैनिकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों की भी है।
इस अवसर पर परिसर में गंभीर और सार्थक चर्चा का माहौल देखने को मिला। छात्रों ने राष्ट्रीय सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और आधुनिक युद्ध की चुनौतियों से जुड़े कई प्रश्न पूछे, जिनका CDS Anil Chauhan ने विस्तार से उत्तर दिया। कार्यक्रम ने युवाओं में राष्ट्रहित और रणनीतिक चिंतन के प्रति नई जागरूकता पैदा की।
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