Jan Jan Ki Sarkar Jan Jan Ke Dwar Uttarakhand: नीतियों और योजनाओं के दौर में अक्सर यह सवाल उठता है कि सरकारें क्या केवल कागज़ों पर ही सक्रिय रहती हैं या वास्तव में आम लोगों की ज़िंदगी में बदलाव ला पाती हैं। उत्तराखण्ड में ‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ कार्यक्रम इसी सवाल का व्यावहारिक जवाब बनकर सामने आया है। यह केवल एक प्रशासनिक पहल नहीं, बल्कि शासन को जनता के करीब लाने का एक ठोस प्रयास है, जिसने सुशासन, संवेदनशीलता और जनहित को नई परिभाषा दी है।
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उत्तराखण्ड की भौगोलिक परिस्थितियाँ हमेशा से चुनौतीपूर्ण रही हैं। पहाड़ी इलाकों में दूर-दराज़ बसे गांव, सीमित संसाधन और आवागमन की कठिनाइयां इन सबके बीच सरकारी योजनाओं का ज़मीनी स्तर तक पहुंचना आसान नहीं रहा। ऐसे में यह कार्यक्रम सरकार की उस सोच को दर्शाता है, जिसमें यह मान लिया गया कि अगर जनता दफ्तर तक नहीं आ सकती, तो दफ्तर को जनता तक जाना चाहिए। इसी सोच ने “जन-जन के द्वार” को केवल नारा नहीं, बल्कि कार्यसंस्कृति बना दिया।
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इस कार्यक्रम का मूल मंत्र है सरल प्रक्रियाएं, त्वरित समाधान और पारदर्शी व्यवस्था। पहले जहां लोगों को छोटी-छोटी समस्याओं के लिए कई विभागों के चक्कर लगाने पड़ते थे, अब वहीं एक ही मंच पर शिकायत दर्ज कर उसका समाधान पाने की व्यवस्था की गई है। प्रशासनिक शिविरों, जनसेवा कार्यक्रमों और सीधे संवाद के ज़रिये जनता की समस्याओं को सुना जा रहा है और तय समयसीमा में समाधान सुनिश्चित किया जा रहा है। इससे न केवल लोगों का समय बचा है, बल्कि शासन व्यवस्था पर भरोसा भी मज़बूत हुआ है।
इस पहल की सबसे बड़ी ताकत इसकी संवेदनशीलता है। सरकार ने यह समझा कि हर समस्या केवल फाइलों से नहीं सुलझती, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण भी उतना ही ज़रूरी है। बुजुर्गों की पेंशन, युवाओं की रोज़गार से जुड़ी परेशानियाँ, महिलाओं की सुरक्षा और स्वावलंबन, किसानों की ज़मीन और सिंचाई से जुड़े मुद्दे—इन सब पर व्यक्तिगत ध्यान दिया गया। कई मामलों में अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर समस्याओं को समझा और वहीं समाधान के निर्देश दिए। इससे जनता को यह एहसास हुआ कि सरकार केवल आदेश देने वाली संस्था नहीं, बल्कि उनकी बात सुनने और समझने वाली साझेदार है।
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पारदर्शिता इस कार्यक्रम की दूसरी बड़ी पहचान बनकर उभरी है। शिकायतों और आवेदनों की ट्रैकिंग, समाधान की समयसीमा और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही इन सबको स्पष्ट किया गया। इससे न केवल भ्रष्टाचार की संभावनाओं पर लगाम लगी, बल्कि प्रशासनिक कार्यप्रणाली भी अधिक विश्वसनीय बनी। लोग अब यह जान पा रहे हैं कि उनकी समस्या किस स्तर पर है और कब तक उसका समाधान होगा। यह पारदर्शी व्यवस्था लोकतांत्रिक मूल्यों को मज़बूत करने का काम कर रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में इस कार्यक्रम का असर विशेष रूप से देखने को मिला है। दूरस्थ गांवों में आयोजित जनसेवा शिविरों के माध्यम से आय, जाति और निवास प्रमाण पत्र, स्वास्थ्य सेवाएं, सामाजिक सुरक्षा योजनाएं और अन्य सरकारी सुविधाएं सीधे उपलब्ध कराई गईं। इससे उन लोगों को बड़ी राहत मिली, जो आर्थिक या भौगोलिक कारणों से पहले इन सेवाओं से वंचित रह जाते थे। सरकार का यह कदम ग्रामीण-शहरी अंतर को कम करने की दिशा में एक अहम पहल साबित हुआ है।
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युवाओं के लिए भी “जन-जन के द्वार” कार्यक्रम नई उम्मीद लेकर आया है। रोज़गार, कौशल विकास और स्वरोज़गार से जुड़ी योजनाओं की जानकारी और लाभ सीधे युवाओं तक पहुंचाए गए। आवेदन प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया और मार्गदर्शन उपलब्ध कराया गया, ताकि योग्य युवा केवल जानकारी के अभाव में पीछे न रह जाएं। इससे युवाओं में यह भरोसा पैदा हुआ है कि सरकार उनके भविष्य को लेकर गंभीर है।
महिलाओं के सशक्तिकरण के संदर्भ में भी इस कार्यक्रम ने सकारात्मक संकेत दिए हैं। स्वयं सहायता समूहों, महिला उद्यमिता योजनाओं और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर त्वरित कार्रवाई ने महिलाओं की भागीदारी और आत्मविश्वास को बढ़ाया है। जब सरकार खुद उनके द्वार तक पहुंचती है, तो महिलाएं भी खुलकर अपनी बात रख पाती हैं, जो सामाजिक बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
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कुल मिलाकर, “जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार” उत्तराखण्ड में शासन के एक नए मॉडल के रूप में उभर रहा है। यह मॉडल बताता है कि सुशासन केवल नियम-कानून बनाने से नहीं, बल्कि उन्हें ज़मीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करने से आता है। यह पहल प्रशासन और जनता के बीच की दूरी को कम कर रही है और लोकतंत्र को अधिक जीवंत बना रही है।
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आज जब लोग यह महसूस कर रहे हैं कि सरकार उनकी समस्याओं को सुन रही है, समझ रही है और समाधान के लिए उनके साथ खड़ी है, तो यह कार्यक्रम अपने उद्देश्य में सफल होता दिखाई देता है। उत्तराखण्ड में यह पहल न केवल वर्तमान की चुनौतियों का समाधान कर रही है, बल्कि भविष्य के लिए एक भरोसेमंद और जनकेंद्रित शासन की नींव भी रख रही है।
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