Meerut Sardhana Kapsad Case: दो दिन। सिर्फ़ दो दिन। और इन दो दिनों ने पूरे गांव का चैन छीन लिया, पूरे सिस्टम को हिलाकर रख दिया। पारस और रूबी दो नाम, जो पहले सिर्फ़ एक गाँव तक सीमित थे, आज पूरे देश की न्यूज़ फ़ीड, WhatsApp फ़ॉरवर्ड और TV डिबेट का हिसाब बन चुके हैं। दो दिन से गायब। दो दिन से पुलिस परेशान। दो दिन से परिवार घबराया हुआ। दो दिन से गाँव में सियासत का शोर। और आज मेरठ पुलिस दोनों को सहारनपुर से कुशल बरामदा करके ले आई। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। कहानी यहीं से शुरू होती है। चेहरों पर न खौफ, न शिकन। न पश्चाताप। न डर। कोई गिल्ट नहीं। बस वही आंखें जैसे कुछ हुआ ही न हो।
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गांव की शांति, जो कभी पहचानी थी
कपड़ गांव को पहले लोग शांति के लिए जानते थे। सरधना का एक ऐसा हिस्सा जहाँ खेती, परिवार और परंपरा का संतुलन था। लेकिन पारस-रूबी केस ने उस शांति को एक ही झटके में तोड़ दिया। आज गांव में लोग कम और अफवाहें ज़्यादा हैं। आज गलियों में बच्चे नहीं, बाल्की पॉलिटिकल बैनर और मीडिया वैन दिख रहे हैं।
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गायब होने से हत्या तक
सवालों का तूफ़ान पारस और रूबी का गायब होना सिर्फ़ एक मिसिंग केस नहीं रहा। यह एक इमोशनल तूफ़ान बन गया। किडनैपिंग है? लव अफ़ेयर? प्रेशर? कास्ट एंगल? हर कोई अपनी थ्योरी के साथ खड़ा हो गया। और इसी बीच एक निर्दोष मां अपनी बेटी को बचाने के चक्कर में अपनी जान खो देती है। यह सिर्फ़ एक हत्या नहीं। यह सिस्टम पर एक बड़ा सवाल है।
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मां की मौत, और दो मुस्कुराते चेहरे
सोचिए… एक मां जो अपनी बेटी के लिए दीवार बन खड़ी होती है। एक मां जो शायद यह सोच कर निकली होगी सब ठीक हो जाएगा। और आज जब पारस और रूबी पुलिस के साथ खड़े हैं, उनके चेहरों पर न दर्द, न बोझ, न अफसोस। यह तस्वीर सबसे ज़्यादा छूने वाली है।
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पुलिस की मेहनत, पर सवाल बाकी
मेरठ पुलिस ने अपना काम किया। सहारनपुर से दोनों को कुशल लाया गया। लॉ एंड ऑर्डर का प्रोसेस फॉलो हुआ। लेकिन क्या सिर्फ रिकवरी काफी है? क्या जस्टिस सिर्फ इतना ही है? जब एक माँ की लाश मिट्टी में मिल चुकी हो, तब फाउंड सेफ शब्द बहुत छोटा पड़ जाता है।
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पॉलिटिक्स गांव में घुस गई
जैसे ही केस नेशनल हुआ, पॉलिटिक्स ने एंट्री ले ली। नेताजी आए। बयान दिए गए दलित बनाम ठाकुर। सिस्टमिक ज़ुल्म। टारगेटेड नैरेटिव। गांव, जो कभी खेतों की महक से जाना जाता था, आज प्रेस कॉन्फ्रेंस का अड्डा बन चुका है।
आज़ाद समाज पार्टी का ‘नाटक’
यहीं पर पॉलिटिक्स का असली चेहरा सामने आता है। आज़ाद समाज पार्टी और चंद्रशेखर रावण का ज़ोर-ज़ोर से बोलना, कैमरे के सामने गरजना लेकिन माँ की मौत पर वो खामोशी, जो कान फाड़ देने वाली है। सवाल ये है अगर ये सिर्फ़ न्याय का मामला है, तो सेलेक्टिव आउटरेज क्यों? अगर ये सिर्फ़ इंसानी मुद्दा है, तो जाति का रंग क्यों? टीवी स्टूडियो में डिबेट चल रही है।‘पारस विलेन है।‘ ‘रूबी विक्टिम है।‘ ‘कोई दोनों गलत।‘ सच इन तीनों के बीच कहीं दबा हुआ है। और जब तक सच बाहर आएगा, तब तक TRP अपना काम कर चुकी होगी।
सिस्टम का फेलियर या समाज का?
यह सवाल सिर्फ पुलिस या एडमिनिस्ट्रेशन का नहीं है। यह सवाल हम सब का है। जब प्यार, प्रेशर और पॉलिटिक्स एक साथ मिल जाते हैं, तब सबसे पहले इंसानी ज़िंदगी कुर्बान होती है। इस केस में भी वही हुआ। भारत की सोच के साथ अगर देखें, तो यह सिर्फ एक गाँव या एक राज्य की कहानी नहीं है। यह एक ऐसा मॉडल बन चुका है जहां पर्सनल फैसलों को पॉलिटिकल फ्यूल बना दिया जाता है। डेवलप्ड देशों में सिस्टम पहले विक्टिम को देखता है। यहां पहले नैरेटिव देखा जाता है।
मां का कसूर क्या था?
इस पूरी कहानी में सबसे ज़्यादा भुला दी गई शक्सियत वो मां ना उसका नाम ट्रेंडिंग है। ना उसकी तस्वीर पोस्टर पर। ना उसके लिए कोई रैली। उसका कसूर सिर्फ़ इतना था कि वो मां थी। और मां होना, शायद इस सिस्टम में सबसे बड़ा जुर्म है। चेहरों की तस्वीर, जो भूलने नहीं देती पारस और रूबी के चेहरे सिर्फ़ दो लोगों के चेहरे नहीं। वो एक सोच हैं आज के समाज का। आज की पॉलिटिक्स का। और आज की पागल सेंसिटिविटी के पतन का। कल तक कपास गांव एक नॉर्मल ज़िंदगी जी रहा था।आज हर घर में डर है। हर बात में जाति का लेंस। हर मुद्दे पर पॉलिटिक्स।
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आखिरी सवाल
क्या जस्टिस सिर्फ अरेस्ट और रिकवरी से मिल जाता है?
क्या एक मां की मौत सिर्फ कोलैटरल डैमेज है?
क्या पारस और रूबी के चेहरे सिस्टम को आईना दिखाने के लिए काफी नहीं?
जब मां मर जाए और चेहरे पर शिकन तक न हो, तब समाज को समझना चाहिए गलती सिर्फ दो लोगों की नहीं, पूरे सिस्टम की है।यह केस सिर्फ मेरठ सरधना कपसाड केस नहीं है। यह एक वॉर्निंग है। अगर अब भी हमने सच में, न्याय और इंसानियत को पॉलिटिक्स से ऊपर नहीं रखा तो कल किसी और गांव का नाम ट्रेंडिंग होगा।
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