Sanatan Hindu Ekta Padayatra: Dhirendra Shastri leading the march from Delhi to Vrindavan with massive crowd support
Sanatan Hindu Ekta Padayatra Article: दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों एक अलग ही दृश्य दिखाई दे रहा है। भीड़ है, जयघोष है, भगवा ध्वज है और उसके बीच एक चेहरा धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री। 104 डिग्री बुखार के बावजूद चलते हुए। यह दृश्य किसी फिल्मी कथा जैसा लगता है, लेकिन यह एक वास्तविक पदयात्रा है ‘सनातन हिंदू एकता पदयात्रा’, जो दिल्ली से शुरू होकर अब वृंदावन की ओर बढ़ रही है। आज इस यात्रा का सातवां दिन है और भीड़ का आकार हर दिन बढ़ता जा रहा है।

यात्रा का उद्देश्य सिर्फ धार्मिक नहीं बताया जा रहा, बल्कि धर्म और राजनीति के संगम से निकला वह संदेश है, जो बदलते भारत की तस्वीर में नए रंग भरता दिखता है सनातन धर्म का प्रचार, भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का संकल्प, यमुना की स्वच्छता का आह्वान, और श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण जैसे सात बड़े संकल्प, लेकिन इस यात्रा में सिर्फ धीरेंद्र शास्त्री नहीं हैं। मंच पर कवि भी हैं, नेता भी, और जनता भी। यह एक धार्मिक पदयात्रा है या सामाजिक आंदोलन यह बहस अलग है, लेकिन भीड़ की आवाज कहती है कि इस यात्रा ने लोगों के भीतर कुछ जगाया है।
यात्रा और धीरेंद्र शास्त्री
भीड़ की उम्मीदें और नेतृत्व की जिम्मेदारी आज के दौर में जब हर मुद्दा सोशल मीडिया पर पैदा होकर वहीं समाप्त हो जाता है, तब यह यात्रा सड़क पर उतरकर एक अलग किस्म की ऊर्जा पैदा कर रही है। धीरेंद्र शास्त्री इस यात्रा की धुरी हैं। बुखार में भी उनसे जुड़े वीडियो वायरल होते हैं, जिसमें वे धीमी आवाज़ में कहते हैं ‘यात्रा का संकल्प अधूरा छोड़कर नहीं जाएंगे।’
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यह बयान जितना भावनात्मक है, उतना ही राजनीतिक और धार्मिक संकेतों से भरा हुआ भी। जनता उन्हें सिर्फ कथा-वाचक के रूप में नहीं देख रही, बल्कि एक ऐसे नेतृत्व के तौर पर जो धर्म को सामाजिक अभियान में बदलना चाहता है। यात्रा के दौरान कई जगहों पर जो दृश्य उभरे—लोग फूल बरसाते हुए, महिलाएँ आरती करती हुईं, बच्चे मंत्रोच्चार करते हुए ये सब मिलकर एक सांस्कृतिक लहर बनाते दिखे।

कुमार विश्वास का जुड़ना, काव्य और राजनीति का संगम
इस पदयात्रा में जब कुमार विश्वास दिखाई देते हैं, तो भीड़ का चरित्र बदल जाता है। मंच पर उनकी उपस्थिति, उनकी आवाज़, और उनका अंदाज़ यात्रा को भावनात्मक भी बनाता है और प्रभावशाली भी।कुमार विश्वास ने कहा, ‘यह यात्रा भारत को एक करने का संकल्प लेकर निकली है। यह सिर्फ धर्म की बात नहीं है, यह राष्ट्रभावना का जागरण है।’ उनका यह बयान कहीं न कहीं उस व्यापक विमर्श को छूता है जो देश में सांस्कृतिक एकता के नाम पर लगातार मजबूत हो रहा है। कविता, संस्कृति, धर्म और राष्ट्र—इन सबका एक साथ मंच पर आना भीड़ को और मजबूती देता है।
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नरोत्तम मिश्रा और विजय शर्मा, राजनीतिक संदेश क्या है?
धार्मिक कार्यक्रमों में राजनीतिक चेहरों का आना नई बात नहीं। लेकिन मध्य प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा और छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा का इस यात्रा में शामिल होना यात्रा के उद्देश्य को एक बड़े राजनीतिक संदर्भ से जोड़ देता है। सवाल यह उठता है,
क्या यह यात्रा सिर्फ धार्मिक है?
क्या यह सांस्कृतिक चेतना की पदयात्रा है?
या यह भावनाओं की ऐसी धारा है, जिसे चुनावी राजनीति भी भुनाना चाहती है? ‘धर्म और राजनीति दोनों एक ही सड़क पर चल रहे हैं, फर्क सिर्फ इस बात का है कि कौन किसे आगे चलने दे रहा है।’ यमुना की सफाई, कृष्ण जन्मभूमि मंदिर, आस्था और मुद्दों का मेल
यात्रा के सात संकल्पों में दो खास हैं
यमुना को स्वच्छ बनाने का संकल्प,श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर विशाल भव्य मंदिर निर्माण का संकल्प। यमुना की हालत किसी से छिपी नहीं। हर सरकार आई, वादे हुए, योजनाएं बनीं, करोड़ों खर्च हुए, लेकिन नदी यथावत। जब धीरेंद्र शास्त्री यात्रा में कह रहे हैं कि यमुना को बचाना होगा, तो वह एक आवश्यक सामाजिक मुद्दे को धार्मिक भावनाओं के साथ जोड़ रहे हैं। इसी तरह जन्मभूमि मंदिर का मुद्दा भी देश की धार्मिक चेतना को सीधे छूता है। यह संदेश भीड़ को आकर्षित कर रहा है, जोड़ रहा है और एक लंबे आंदोलन की रूपरेखा की ओर इशारा करता है।
वृंदावन की ओर बढ़ता कदम, सांस्कृतिक चेतना या राजनीतिक जमीन?
यह पदयात्रा 16 नवंबर को वृंदावन में समाप्त होगी। लेकिन क्या यह यात्रा सिर्फ खत्म होगी? या इसके बाद एक नया अध्याय शुरू होगा? क्या यह सनातन एकता का सिर्फ उद्घोष है या किसी बड़े आंदोलन का प्रारंभ? भीड़ की संख्या, समर्थन की तीव्रता और वायरल होते वीडियो एक संकेत दे रहे हैं—भारत का सांस्कृतिक विमर्श बदल रहा है। और इस बदलाव में ऐसे यात्राओं का योगदान कम नहीं है।
‘सवाल यात्रा का नहीं, यात्रा के बाद की दिशा का है।’
धीरेंद्र शास्त्री की ‘सनातन हिंदू एकता पदयात्रा’ धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक चेतना और राजनीतिक संदेश तीनों का संगम है। सात दिन में यात्रा का विस्तार जिस तरह बढ़ा है, वह बताता है कि भीड़ सिर्फ चल नहीं रही वह जुड़ रही है। कुमार विश्वास से लेकर कई नेताओं का शामिल होना यात्रा को और विस्मयकारी बना देता है। यात्रा वृंदावन में रुक जाएगी, लेकिन जो सवाल, संदेश और संकल्प इसने खड़े किए हैं वे आगे भी बहस और विमर्श का हिस्सा बने रहेंगे।
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