Justice Surya Kant 53rd CJI: देश के न्यायिक इतिहास में आज का दिन एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज होगा, जब जस्टिस सूर्यकांत देश के 53वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में शपथ ग्रहण करेंगे। एक साधारण परिवार से निकलकर सर्वोच्च न्यायालय की सर्वोच्च कुर्सी तक पहुंचने की यह यात्रा सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था की सामाजिक जड़ों और लोकतांत्रिक विश्वास की भी कहानी है।
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जस्टिस सूर्यकांत उन कुछ न्यायाधीशों में से हैं जिनका न्यायिक दृष्टिकोण हमेशा नागरिकों के अधिकारों और राज्य की शक्ति के संतुलन पर केंद्रित रहा है। उन्होंने बार-बार यह दिखाया कि अदालत सिर्फ कानून की व्याख्या का मंच नहीं है, बल्कि न्याय की सामाजिक चेतना का भी प्रहरी है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक उनके फ़ैसले अक्सर एक व्यापक सोच का संकेत देते रहे हैं, कि न्यायालय सिर्फ फैसले नहीं देता, बल्कि समाज के नैतिक ढांचे को भी परिभाषित करता है।
आज जब वे मुख्य न्यायाधीश के रूप में पद संभालेंगे, तो देश की अपेक्षाएं सिर्फ औपचारिक या प्रतीकात्मक नहीं हैं। भारत ऐसे समय में है जब न्यायपालिका से साहसिक और निष्पक्ष नेतृत्व की अपेक्षा बढ़ी है। जनहित याचिकाओं से लेकर संवैधानिक व्याख्याओं तक आम नागरिक आशा करता है कि सर्वोच्च न्यायालय लोकतांत्रिक ढांचे की अंतिम ढाल के रूप में खड़ा रहेगा।
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इसे मीडिया की सर भाषा में समझें तो इस नियुक्ति के पीछे एक गहरा संदेश है जब अधिकांश नागरिक संस्थाओं पर राजनीतिक छाप की बहस होती है, तब सुप्रीम कोर्ट का नेतृत्व ऐसा व्यक्ति संभाल रहा है जिसने अपने फैसलों में बार-बार यह जताया कि संविधान सिर्फ कागज़ का दस्तावेज नहीं, बल्कि जीती-जागती आत्मा है।
जस्टिस सूर्यकांत का कार्यकाल ऐसे समय में शुरू हो रहा है जब न्यायपालिका के सामने कई गंभीर चुनौतियां हैं मीडिया की स्वतंत्रता, चुनावी बांड, गोपनीयता का अधिकार, इंटरनेट स्वतंत्रता, अनुच्छेद 14 के तहत समानता की व्याख्या, और केंद्र-राज्य संबंधों में न्यायिक हस्तक्षेप। इन सबके बीच यह जानना जरूरी है कि सूर्यकांत ने अब तक अपने फैसलों में यही संकेत दिया है कि अदालतें न तो भय में काम कर सकती हैं और न ही किसी सत्ता के दबाव में।
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न्यायपालिका में जनता का भरोसा केवल निर्णयों की भाषा से नहीं, बल्कि उनकी निष्ठा और चरित्र से आता है। जस्टिस सूर्यकांत की पहचान एक ऐसे न्यायाधीश के रूप में बनी है जो संवेदनशील हैं, जमीन से जुड़े हैं, और न्याय को केवल तकनीकी धाराओं में नहीं बांधते। उनके फैसलों के पीछे हमेशा एक मानवीय दृष्टि दिखाई देती है एक ऐसी दृष्टि जो नागरिक की गरिमा को सर्वोच्च मानती है।
आज जब वे पद संभालेंगे, तो यह सिर्फ शपथ की रस्म नहीं होगी यह लोकतंत्र की एक गंभीर घोषणा भी होगी। एक ऐसी घोषणा कि भारत में कानून की सर्वोच्चता आज भी जीवित है, और न्यायपालिका आज भी उन नागरिकों की रक्षक है जिनके पास सत्ता नहीं, पर साहस और संविधान पर भरोसा है।
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जस्टिस सूर्यकांत का CJI बनना भारतीय न्यायिक परंपरा के उस मूल सिद्धांत की पुनर्पुष्टि है कि न्यायालय राज्य से ऊपर नहीं, पर उसके सामने बराबरी पर खड़ा होता है। कलम और संविधान साथ लेकर। यही है लोकतंत्र की असली आत्मा।
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