India New Zealand FTA investor confidence: भारत-न्यूजीलैंड एफटीए से निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा यह सिर्फ एक कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक आर्थिक यथार्थ की ठोस सच्चाई है। जब भारत और न्यूजीलैंड जैसे दो लोकतांत्रिक, नियम-आधारित और स्थिर अर्थव्यवस्थाएं मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में आगे बढ़ती हैं, तो उसका सीधा संदेश निवेशकों तक जाता है यह साझेदारी भरोसेमंद है, दीर्घकालिक है और राजनीतिक शोर से ऊपर उठकर आर्थिक प्रगति पर केंद्रित है। एफटीए का मूल अर्थ है टैरिफ में कमी, बाजारों तक आसान पहुंच, सप्लाई चेन की स्थिरता और नीतिगत स्पष्टता यही चार स्तंभ निवेशक भरोसे की नींव बनाते हैं।
आज वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितताओं से जूझ रही है। ऐसे समय में भारत-न्यूजीलैंड एफटीए यह संकेत देता है कि भारत सुधारों की राह से पीछे नहीं हटेगा। मैन्युफैक्चरिंग, एग्री-प्रोसेसिंग, डेयरी, आईटी, फिनटेक, ग्रीन एनर्जी और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में यह समझौता नई पूंजी को आकर्षित करेगा। निवेशक देखते हैं कि एफटीए केवल व्यापार बढ़ाने का औजार नहीं, बल्कि विवाद समाधान, बौद्धिक संपदा संरक्षण और पारदर्शी नियमों की गारंटी भी देता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ मानते हैं यह समझौता एफडीआई के लिए ग्रीन सिग्नल है।
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लेकिन हर बड़े सुधार के साथ कुछ कट्टरपंथी आवाजें भी उठती हैं। वही पुराने डर, वही घिसे-पिटे तर्क घरेलू उद्योग खत्म हो जाएगा, विदेशी कंपनियां कब्जा कर लेंगी”, “किसानों का नुकसान होगा।” सवाल यह है कि क्या ये तर्क आज की हकीकत से मेल खाते हैं? क्या दुनिया से कटकर कोई अर्थव्यवस्था आगे बढ़ी है? कट्टरपंथी सोच अक्सर तथ्यों से नहीं, आशंकाओं से चलती है। वे यह भूल जाते हैं कि एफटीए का मतलब बिना शर्त दरवाजे खोलना नहीं, बल्कि स्मार्ट इंटीग्रेशन है—जहां संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा के साथ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलता है।
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भारत पहले ही कई क्षेत्रों में वैश्विक सप्लाई चेन का भरोसेमंद हिस्सा बन चुका है। न्यूजीलैंड के साथ एफटीए से कृषि तकनीक, डेयरी मैनेजमेंट, फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड्स और कोल्ड-चेन में सहयोग बढ़ेगा। इससे उत्पादकता बढ़ेगी, निर्यात में वैल्यू ऐडिशन होगा और किसानों को नए बाजार मिलेंगे। कट्टरपंथी आलोचक जब “नुकसान” की बात करते हैं, तो वे यह नहीं बताते कि उच्च गुणवत्ता मानकों और प्रतिस्पर्धा से स्थानीय उद्योग कैसे मजबूत होते हैं। डर फैलाना आसान है, सुधार करना मुश्किल और यही फर्क दूरदर्शिता और जड़ता के बीच रेखा खींचता है।
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निवेशक केवल टैक्स या सस्ती लागत नहीं देखते; वे नीति की निरंतरता और नेतृत्व की स्पष्टता देखते हैं। भारत-न्यूजीलैंड एफटीए यह भरोसा देता है कि नियम बदलेंगे नहीं, अवसर बढ़ेंगे। डिजिटल ट्रेड, सेवाओं का मुक्त प्रवाह और स्किल मोबिलिटी जैसे प्रावधान स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए भी सकारात्मक संकेत हैं। कट्टरपंथियों की आलोचना अक्सर अतीत में अटकी रहती है, जबकि निवेश का स्वभाव भविष्य-दृष्टि पर टिका होता है।
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अंततः सवाल यह नहीं कि एफटीए होगा या नहीं, सवाल यह है कि भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अग्रणी बनना चाहता है या शंकाओं की कैद में रहना चाहता है। विशेषज्ञों की राय साफ है भारत-न्यूजीलैंड एफटीए से निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा, रोजगार सृजित होंगे और अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी। कट्टरपंथी कटाक्ष करते रहें, लेकिन दुनिया आगे बढ़ रही है और भारत भी।
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