Indian Budget foreign influence: जब हर साल 1 फरवरी को संसद में बजट पेश होता है, तो आम तौर पर चर्चा टैक्स, सब्सिडी, योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित रह जाती है। लेकिन बजट सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है। यह एक ऐसी परंपरा है, जिसके पीछे सदियों का इतिहास, सत्ता और जनता के रिश्ते की कहानी और दुनिया भर से आए विचारों की छाप छिपी हुई है। Budget 2026 की चर्चा के साथ यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि भारत का बजट कितना अपना है और उस पर विदेशों, खासकर ब्रिटेन और फ्रांस, का कितना असर रहा है। आपको ग्राफिक्स के जरिये समझाते हैं ।

• युद्ध और औद्योगीकरण ने बजट को ज़रूरी बनाया (Indian Budget Foreign Influence)
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भारत के बजट पर विदेशी असर
• बजट सिर्फ आंकड़ों का दस्तावेज़ नहीं
– यह सरकार की आर्थिक सोच, सामाजिक प्राथमिकताओं और विकास की दिशा को दिखाता है
टैक्स, खर्च, सब्सिडी और योजनाओं के ज़रिए भविष्य का रोडमैप तय होता है
• ‘Budget’ शब्द की जड़ें यूरोप में
बजट शब्द फ्रेंच शब्द Bougette से निकला, मतलब छोटा बैग
पुराने समय में वित्त मंत्री दस्तावेज़ बैग में लेकर संसद आते थे
• आधुनिक बजट प्रणाली की शुरुआत ब्रिटेन से
17वीं–18वीं शताब्दी में ब्रिटेन में संसद शक्तिशाली हुई
टैक्स और खर्च पर संसद की मंजूरी अनिवार्य बनी
यहीं से जवाबदेही आधारित बजट की परंपरा शुरू हुई

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• फ्रांस और यूरोप का भी योगदान
फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों में
कर-प्रशासन और वार्षिक वित्तीय योजना की संस्थागत व्यवस्था बनी
यही मॉडल आगे दुनिया में फैला
• औपनिवेशिक शासन से दुनिया में फैला बजट मॉडल
ब्रिटेन और फ्रांस ने अपने उपनिवेशों में बजट, टैक्स और लेखा प्रणाली लागू की
आज़ादी के बाद भी कई देशों ने यही ढांचा जारी रखा
• युद्ध और औद्योगीकरण ने बजट को ज़रूरी बनाया
19वीं–20वीं सदी में युद्ध, रेल, सेना, शिक्षा, स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ा
बिना वार्षिक योजना के सरकार चलाना मुश्किल हुआ
बजट प्रशासनिक ज़रूरत से नीति का औजार बना
• वैश्वीकरण और अंतरराष्ट्रीय मानकों का असर
घाटा, कर्ज, सब्सिडी, टैक्स सुधार जैसे शब्द वैश्विक बने
निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों के लिए बजट को तुलनीय बनाया गया
पारदर्शिता और अनुशासन पर ज़ोर बढ़ा
• भारत में बजट की शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान
सेना, प्रशासन और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए स्थिर राजस्व चाहिए था
कर प्रणाली और वार्षिक लेखा पेश करने की परंपरा बनी
• आजादी के बाद बजट का चरित्र बदला
औपनिवेशिक ज़रूरतों से हटकर
जनता के कल्याण और राष्ट्रीय विकास पर केंद्रित हुआ
• भारतीय बजट पर ब्रिटिश प्रभाव कहां दिखता है?
संसद में बजट प्रस्तुति
बजट भाषण, वित्त विधेयक, विनियोग विधेयक
जवाबदेही और संसदीय नियंत्रण की व्यवस्था
• वैश्विक असर कहां दिखता है?
राजकोषीय घाटा, प्राथमिक घाटा, सार्वजनिक ऋण
टैक्स सुधार, सब्सिडी तार्किककरण
अंतरराष्ट्रीय आर्थिक शब्दावली और रिपोर्टिंग
• लेकिन फैसले पूरी तरह भारतीय जरूरतों से
कृषि, रोजगार, महंगाई, गरीब कल्याण
राज्यों की मांगें और सामाजिक संतुलन
घरेलू राजनीति और लोकतांत्रिक दबाव निर्णायक
• विदेशी प्रेरणा, लेकिन नीति देश के भीतर तय
दुनिया के अनुभवों से सीख
पर अंतिम एजेंडा भारतीय परिस्थितियों के अनुसार
• निष्कर्ष साफ है
बजट की परंपरा विदेशी है
लेकिन आज का भारतीय बजट सोच, लक्ष्य और प्राथमिकताओं में पूरी तरह भारतीय
• 1 फरवरी का बजट क्या बताता है?
आने वाले साल की आर्थिक दिशा
विकास, कल्याण और स्थिरता के बीच संतुलन
सरकार की असली प्राथमिकताएं
वैश्वीकरण और अंतरराष्ट्रीय मानकों का असर
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बजट शब्द सुनते ही दिमाग में जो पहली तस्वीर आती है, वह है वित्त मंत्री का हाथ में पकड़ा हुआ ब्रीफकेस और संसद की सीढ़ियों पर खिंचती तस्वीरें। यह परंपरा सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि इतिहास का जीवित प्रतीक है। ‘बजट’ शब्द की जड़ें फ्रेंच भाषा के शब्द ‘बुजेट’ या ‘बुजेट्ट’ में मिलती हैं, जिसका अर्थ होता है छोटा थैला या बैग। यूरोप में, खासकर ब्रिटेन में, जब वित्त मंत्री संसद में राजकोषीय प्रस्ताव रखते थे, तो जरूरी कागजात एक बैग में लाए जाते थे। धीरे-धीरे वही बैग सरकार की पूरी आर्थिक योजना का प्रतीक बन गया। आज भले ही फाइलें डिजिटल हो चुकी हों, लेकिन ब्रीफकेस की तस्वीरें इस परंपरा को जीवित रखती हैं।
• भारत में बजट की शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान (Indian Budget Foreign Influence)
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आधुनिक बजट प्रणाली का असली विकास ब्रिटेन में हुआ। 17वीं और 18वीं शताब्दी के दौरान वहां एक बड़ा राजनीतिक बदलाव आया। राजा की निरंकुश शक्तियां सीमित होने लगीं और संसद का प्रभाव बढ़ता गया। टैक्स लगाने और सरकारी खर्च को मंजूरी देने का अधिकार राजा से संसद के पास आया। यहीं से जवाबदेही का सिद्धांत मजबूत हुआ। सरकार को यह बताना जरूरी हो गया कि वह जनता से पैसा कहां से ले रही है और उसे कहां खर्च कर रही है। इसी जरूरत ने बजट को जन्म दिया। 19वीं शताब्दी तक बजट भाषण, वार्षिक लेखा और संसद में वित्तीय बहसें ब्रिटिश लोकतंत्र का अहम हिस्सा बन चुकी थीं।
यह मॉडल सिर्फ ब्रिटेन तक सीमित नहीं रहा। यूरोपीय शक्तियों के विस्तार के साथ उनकी प्रशासनिक प्रणालियां भी दुनिया के कई हिस्सों तक पहुंचीं। फ्रांस ने भी अपने उपनिवेशों में कर-प्रशासन, लेखा प्रणाली और वार्षिक वित्तीय योजनाओं को लागू किया। हालांकि फ्रांसीसी मॉडल ब्रिटिश मॉडल से कुछ अलग था, लेकिन मूल विचार वही था राज्य की आय और व्यय को लिखित, सार्वजनिक और नियंत्रित ढांचे में लाना। इस तरह बजट एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य की पहचान बनता चला गया।
आजादी के बाद बजट का चरित्र बदला
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दुनिया में बजट परंपरा के फैलने के पीछे सिर्फ उपनिवेशवाद ही कारण नहीं था। 19वीं और 20वीं शताब्दी में औद्योगीकरण, बड़े युद्धों और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा ने सरकारी खर्च को कई गुना बढ़ा दिया। रेलवे, सेना, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसी जरूरतों के लिए सरकारों को भारी धन चाहिए था। ऐसे में बिना योजना और दस्तावेज़ के काम चलाना संभव नहीं था। बजट अब सिर्फ प्रशासनिक औजार नहीं, बल्कि नीति निर्धारण का केंद्र बन गया।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद वैश्विक आर्थिक ढांचा और मजबूत हुआ। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं, निवेशक और रेटिंग एजेंसियां सामने आईं। घाटा, कर्ज, टैक्स बेस, सब्सिडी और पारदर्शिता जैसे शब्द वैश्विक आर्थिक भाषा का हिस्सा बन गए। कई देशों ने अपने बजट दस्तावेज़ों को इस तरह तैयार करना शुरू किया कि वे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हों और दुनिया उन्हें आसानी से समझ सके। यही वह दौर था जब बजट सिर्फ घरेलू दस्तावेज़ नहीं, बल्कि वैश्विक संवाद का हिस्सा भी बन गया।
भारतीय बजट पर ब्रिटिश प्रभाव कहां दिखता है?
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भारत में बजट की कहानी सीधे तौर पर औपनिवेशिक शासन से जुड़ी है। ब्रिटिश सरकार को भारत में सेना, प्रशासन और बुनियादी ढांचे के लिए स्थिर राजस्व चाहिए था। इसके लिए कर-व्यवस्था और वार्षिक लेखा प्रस्तुत करना जरूरी था। धीरे-धीरे भारत में भी बजट एक औपचारिक प्रक्रिया के रूप में विकसित हुआ। आज़ादी के बाद भारत ने वही संसदीय ढांचा अपनाया, लेकिन उसके उद्देश्य पूरी तरह बदल गए। अब बजट किसी साम्राज्य की जरूरतों के लिए नहीं, बल्कि जनता के कल्याण और राष्ट्रीय विकास के लिए तैयार किया जाने लगा। (Indian Budget Foreign Influence)
आज जब हम भारतीय बजट को देखते हैं, तो साफ दिखाई देता है कि यह न तो पूरी तरह विदेशी है और न ही पूरी तरह स्वदेशी। इसकी संरचना और प्रक्रिया में ब्रिटिश संसदीय परंपरा की झलक मिलती है। बजट भाषण, वित्त विधेयक, विनियोग विधेयक, लेखानुदान ये सभी उसी परंपरा की देन हैं। संसद के माध्यम से सरकार को जवाबदेह बनाना भी उसी लोकतांत्रिक सोच से आया है।
• वैश्विक असर कहां दिखता है? (Indian Budget Foreign Influence)
साथ ही, बजट की भाषा और आर्थिक शब्दावली में वैश्विक प्रभाव साफ दिखता है। राजकोषीय घाटा, प्राथमिक घाटा, सार्वजनिक ऋण, कर सुधार, सब्सिडी का तार्किककरण जैसे शब्द किसी एक देश की देन नहीं हैं। ये वैश्विक अर्थशास्त्र की साझा भाषा हैं। भारत ने समय के साथ इन्हें अपनाया, ताकि उसकी आर्थिक स्थिति दुनिया के सामने स्पष्ट और तुलनीय हो सके।
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लेकिन यहीं कहानी खत्म नहीं होती। अगर बजट के अंदर झांककर देखें, तो असली फैसले भारतीय परिस्थितियों से तय होते हैं। कृषि, रोजगार, महंगाई, गरीब कल्याण, राज्यों की मांगें, बुनियादी ढांचा, डिजिटल इंडिया, शिक्षा और स्वास्थ्य ये सभी प्राथमिकताएं भारत की अपनी सामाजिक और राजनीतिक जरूरतों से निकलती हैं। विदेशी अनुभव प्रेरणा दे सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय देश के भीतर ही लिए जाते हैं। (Indian Budget Foreign Influence)
Indian Budget Foreign Influence: कभी-कभी यह धारणा बनती है कि बजट अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं या विदेशी दबाव में बनता है। हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के संकेतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति में सरकार को अपने मतदाताओं के प्रति जवाबदेह होना पड़ता है। यही कारण है कि भारत का बजट वैश्विक संकेतों और घरेलू जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है।
• लेकिन फैसले पूरी तरह भारतीय जरूरतों से
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Indian Budget Foreign Influence: इस पूरे सफर को देखें तो एक बात साफ होती है। बजट की परंपरा भले ही यूरोप, खासकर ब्रिटेन और फ्रांस, से आई हो, लेकिन उसका अर्थ और एजेंडा समय के साथ भारतीय हो चुका है। आज का बजट सिर्फ आय-व्यय का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि यह बताता है कि सरकार देश को किस दिशा में ले जाना चाहती है। यह विकास और कल्याण के बीच संतुलन की कहानी है, स्थिरता और आकांक्षाओं के बीच संवाद है।
इसलिए जब Budget 2026 पेश होगा, तो उसे सिर्फ विदेशी छाप के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। बेहतर यह है कि हम समझें कि कैसे एक विदेशी मूल की परंपरा ने भारतीय लोकतंत्र में अपनी जगह बनाई और कैसे भारत ने उसे अपनी जरूरतों, मूल्यों और सपनों के अनुरूप ढाल लिया। एक फरवरी का बजट दरअसल इस बात का संकेत होता है कि आने वाले साल में देश किन प्राथमिकताओं को चुनेगा और किस रास्ते पर आगे बढ़ेगा। (Indian Budget Foreign Influence)
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