Oil Import Bill: देश में खाद्य तेल की बढ़ती मांग, घरेलू उत्पादन की सीमाएं और वैश्विक बाजार में लगातार बनी अनिश्चितताओं के बीच भारत का Oil Import Bill एक बार फिर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की ओर बढ़ रहा है। उद्योग संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) का अनुमान है कि चालू तेल विपणन वर्ष (नवंबर 2025 से अक्टूबर 2026) के दौरान भारत का Oil Import Bill करीब 1.75 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। पिछले वर्ष यह खर्च लगभग 1.61 लाख करोड़ रुपये था। यानी एक साल में करीब 9 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि घरेलू स्तर पर तिलहन उत्पादन नहीं बढ़ाया गया तो आने वाले वर्षों में Oil Import Bill लगातार बढ़ता रहेगा, जिससे देश की विदेशी मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। यही वजह है कि कृषि और खाद्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ अब तिलहन उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।
आयात बढ़ने और रुपये की कमजोरी ने बढ़ाई चिंता
एसईए के अध्यक्ष संजीव अस्थाना ने सदस्यों को लिखे पत्र में कहा कि भारत आज खाद्य तेल के मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। उन्होंने कहा कि बढ़ता Oil Import Bill केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह देश से बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा के बाहर जाने का संकेत भी है।
उनके अनुसार, इस वर्ष खाद्य तेल का आयात बढ़ने के साथ-साथ भारतीय रुपये में कमजोरी आने से आयात और महंगा हो गया है। रुपये के अवमूल्यन का सीधा असर विदेशों से खरीदे जाने वाले पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सूरजमुखी तेल की कीमतों पर पड़ा है। इसका परिणाम यह हुआ कि देश का कुल Oil Import Bill तेजी से ऊपर जा रहा है।
आठ महीनों में ही खर्च पहुंचा 1.19 लाख करोड़ रुपये
एसईए के आंकड़ों के मुताबिक, मौजूदा तेल विपणन वर्ष के पहले आठ महीनों में ही खाद्य तेल आयात पर लगभग 1.19 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा करीब 99 हजार करोड़ रुपये था।
इस बढ़ोतरी से साफ संकेत मिलते हैं कि यदि यही रफ्तार जारी रही तो साल खत्म होने तक Oil Import Bill 1.75 लाख करोड़ रुपये के अनुमानित स्तर को पार भी कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति देश के व्यापार घाटे पर भी असर डाल सकती है।
खाद्य तेल आयात में सात प्रतिशत की बढ़ोतरी
एसईए के अनुसार नवंबर 2025 से जून 2026 के बीच भारत ने 103.88 लाख टन खाद्य तेल का आयात किया, जबकि पिछले तेल वर्ष की समान अवधि में यह आंकड़ा 97.29 लाख टन था। यानी आयात की मात्रा में लगभग सात प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
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घरेलू मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन उत्पादन उसी अनुपात में नहीं बढ़ पा रहा है। यही कारण है कि भारत को अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदना पड़ रहा है। इससे Oil Import Bill लगातार बढ़ रहा है।
वैश्विक बाजार भी बढ़ा रहा दबाव
केवल घरेलू कारण ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भी भारत के Oil Import Bill को प्रभावित कर रही हैं। इंडोनेशिया द्वारा बायोडीजल कार्यक्रम का विस्तार किए जाने से पाम ऑयल का बड़ा हिस्सा ईंधन उत्पादन में इस्तेमाल हो रहा है। इससे वैश्विक बाजार में खाद्य तेल की उपलब्धता घट रही है।
इसके अलावा भू-राजनीतिक तनाव, समुद्री माल ढुलाई की बढ़ती लागत और बीमा प्रीमियम में वृद्धि के कारण भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। इन परिस्थितियों का सीधा असर भारत के आयात खर्च पर पड़ रहा है।
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कमजोर मानसून से उत्पादन पर खतरा
विशेषज्ञों की चिंता केवल आयात तक सीमित नहीं है। इस वर्ष कई राज्यों में मानसून की शुरुआत धीमी रही, जिसके कारण तिलहन फसलों की बुवाई प्रभावित हुई है। 17 जुलाई तक तिलहन की कुल बुवाई लगभग 147 लाख हेक्टेयर रही, जबकि पिछले वर्ष इसी समय यह 155.7 लाख हेक्टेयर थी।
अगर अगस्त और सितंबर में सामान्य से कम बारिश होती है तो तिलहन की पैदावार पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है। ऐसे में अगले वर्ष भी भारत का Oil Import Bill ऊंचा बना रह सकता है।
विदेशी मुद्रा पर बढ़ेगा दबाव
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि लगातार बढ़ता Oil Import Bill देश की विदेशी मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। यदि घरेलू उत्पादन नहीं बढ़ा तो हर वर्ष बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खाद्य तेल खरीदने में खर्च होती रहेगी।
विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार को तिलहन मिशन, किसानों को बेहतर समर्थन मूल्य, आधुनिक बीज, सिंचाई सुविधाएं और कृषि तकनीक उपलब्ध कराने पर अधिक ध्यान देना होगा। इससे देश धीरे-धीरे खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भर बन सकता है।
समाधान क्या हो सकता है?
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार भारत के सामने सबसे बड़ा समाधान घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाना है। यदि किसानों को बेहतर तकनीक, गुणवत्तापूर्ण बीज और पर्याप्त बाजार समर्थन मिले तो सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी और मूंगफली जैसी फसलों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
इसके अलावा खाद्य तेल की प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाने, भंडारण व्यवस्था मजबूत करने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए दीर्घकालिक नीति की जरूरत है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में Oil Import Bill देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
कुल मिलाकर मौजूदा संकेत बताते हैं कि भारत को खाद्य तेल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के लिए तेज़ी से कदम उठाने होंगे। अन्यथा बढ़ती वैश्विक कीमतें, कमजोर रुपया और घरेलू उत्पादन की सीमाएं हर साल Oil Import Bill को नए रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचाती रहेंगी।
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