Glacier Recession in Uttarakhand: उत्तराखंड के हिमालयी ग्लेशियरों को लेकर सामने आई एक नई वैज्ञानिक समीक्षा ने चिंता बढ़ा दी है। भारतीय मध्य हिमालय में ग्लेशियर लगातार पीछे खिसक रहे हैं और अलग-अलग ग्लेशियरों में यह रफ्तार काफी अलग पाई गई है। नई स्टडी में शामिल आंकड़ों के अनुसार ग्लेशियरों के पीछे हटने की औसत दर करीब 23.23 मीटर प्रति वर्ष रही है, जबकि टिहरी गढ़वाल का खतलिंग ग्लेशियर करीब 88 मीटर प्रति वर्ष की दर से पीछे हटने वाले ग्लेशियरों में सबसे तेज है।
यह अध्ययन UPES, देहरादून और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी से जुड़े शोधकर्ताओं ने किया है। Time dependent assessment of glacier recession in the Indian Central Himalaya नाम की यह समीक्षा 15 सितंबर 2026 को Discover Geoscience में प्रकाशित हुई। इसमें ज्योति कुमारी, गिरिश सी. कोठियारी, अतुल कुमार पतिदार और वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता समेत शोधकर्ताओं ने भारतीय मध्य हिमालय के ग्लेशियरों से जुड़े दशकों के अध्ययनों का विश्लेषण किया है।
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23 ग्लेशियरों के आंकड़ों से सामने आई तस्वीर
Glacier Recession in Uttarakhand के 23 प्रमुख ग्लेशियरों के रिट्रीट यानी पीछे हटने से जुड़े पहले के वैज्ञानिक अध्ययनों को एक साथ देखा गया। शोधपत्र के मुताबिक उपलब्ध रिकॉर्ड में इन ग्लेशियरों का कुल संचयी रिट्रीट 25,621.01 मीटर दर्ज किया गया है। हालांकि यह आंकड़ा अलग-अलग ग्लेशियरों के अलग-अलग समयावधि के अध्ययनों को जोड़कर तैयार हुआ है। इसलिए इसे एक ही 34 साल की अवधि में सभी ग्लेशियरों के पीछे हटने के रूप में नहीं समझना चाहिए। अध्ययन में औसत ग्लेशियर रिट्रीट रेट 23.23 मीटर प्रति वर्ष बताई गई है।
शोधकर्ताओं ने फील्ड सर्वे, टोपोग्राफिक माप, सैटेलाइट इमेजरी, डिजिटल एलिवेशन मॉडल और अलग-अलग समय के रिमोट सेंसिंग आंकड़ों से जुड़े पूर्व अध्ययनों का इस्तेमाल किया। वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि अलग-अलग ग्लेशियरों के आंकड़ों की समयावधि और अध्ययन की तकनीक समान नहीं थी, इसलिए इनके रिट्रीट रेट की तुलना करते समय यह अंतर ध्यान में रखना जरूरी है।

खतलिंग ग्लेशियर सबसे तेज पीछे हटा
उत्तराखंड में Khatling Glacier इस अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण चिंताओं में शामिल है। शोधपत्र में पूर्व अध्ययन के हवाले से बताया गया है कि खतलिंग ग्लेशियर 1965 से 2014 के बीच 4,000 मीटर से ज्यादा पीछे हटा। इसकी औसत रिट्रीट रेट करीब 88 मीटर प्रति वर्ष आंकी गई। इस दौरान बड़े खतलिंग ग्लेशियर का हिस्सा कई छोटे ग्लेशियरों में विभाजित हो गया।
खतलिंग की स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अपेक्षाकृत साफ बर्फ वाला ग्लेशियर है। शोध में पाया गया कि साफ बर्फ वाले और कुछ विशेष भौगोलिक परिस्थितियों वाले ग्लेशियर मलबे से ढके ग्लेशियरों की तुलना में तेजी से प्रतिक्रिया कर सकते हैं।
गंगोत्री, पिंडारी और मिलम भी पीछे हट रहे
स्टडी में भारतीय मध्य हिमालय के कई प्रमुख ग्लेशियरों के पुराने रिट्रीट आंकड़ों को शामिल किया गया है। गंगोत्री ग्लेशियर के लिए अलग-अलग अध्ययनों में पीछे हटने की दर दर्ज की गई है, जबकि पिंडारी और मिलम ग्लेशियर भी लंबे समय से बदलाव का सामना कर रहे हैं। शोधपत्र के अनुसार अलग-अलग ग्लेशियरों में रिट्रीट की दर कुछ मीटर प्रति वर्ष से लेकर 80 मीटर से अधिक प्रति वर्ष तक देखी गई है।
मिलम ग्लेशियर विशेष रूप से इसलिए अहम है क्योंकि यह झील से जुड़े ग्लेशियरों के व्यवहार का उदाहरण प्रस्तुत करता है। ग्लेशियर और झील के बीच संपर्क होने पर पानी के कारण बर्फ के पिघलने और टूटने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
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मलबा कहीं ग्लेशियर को बचा रहा, कहीं असर अलग
Glacier Recession in Uttarakhand की रफ्तार केवल तापमान पर निर्भर नहीं करती। ग्लेशियर की ऊंचाई, ढलान, आकार, दिशा, बर्फ की मोटाई और सतह पर मौजूद मलबा भी इसकी गति को प्रभावित करते हैं। शोधपत्र के मुताबिक मोटी supraglacial debris यानी ग्लेशियर की सतह पर जमा चट्टानी सामग्री कई परिस्थितियों में बर्फ के लिए इंसुलेटिंग परत का काम कर सकती है। यही कारण है कि कुछ मलबे से ढके ग्लेशियरों के अग्रभाग की रिट्रीट रेट अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।
इसके उलट साफ बर्फ वाले और झील में समाप्त होने वाले ग्लेशियरों में रिट्रीट ज्यादा तेज हो सकती है। अध्ययन में झील पर समाप्त होने वाले ग्लेशियरों की औसत रिट्रीट रेट करीब 34.9 मीटर प्रति वर्ष और जमीन पर समाप्त होने वाले ग्लेशियरों की करीब 22.5 मीटर प्रति वर्ष बताई गई है।
2000 के बाद बदलाव पर खास नजर
स्टडी में कई ग्लेशियरों के लिए समय के साथ रिट्रीट की गति में बदलाव भी सामने आया है। शोधकर्ताओं ने पाया कि कई जगह 2000 के बाद ग्लेशियरों की स्थिति में तेजी से बदलाव दिखाई देता है। गंगोत्री और डोकरियानी जैसे ग्लेशियरों के मास बैलेंस में लंबे समय से नकारात्मक स्थिति दर्ज की गई है।
Negative mass balance का आसान मतलब है कि किसी अवधि में ग्लेशियर जितनी बर्फ और बर्फीला पानी हासिल करता है, उससे ज्यादा मात्रा में बर्फ खो देता है। लगातार नकारात्मक मास बैलेंस ग्लेशियर की मोटाई और कुल बर्फ की मात्रा में कमी का संकेत देता है।
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26 फीसदी ग्लेशियर तेज रफ्तार से पीछे हटे
शोधपत्र के संकलित आंकड़ों के अनुसार अधिकांश ग्लेशियरों का रिट्रीट अलग-अलग स्तर पर है। करीब 56 फीसदी ग्लेशियर 10 से 30 मीटर प्रति वर्ष की मध्यम रफ्तार वाले समूह में आते हैं, जबकि करीब 26 फीसदी ग्लेशियर 30 मीटर प्रति वर्ष से ज्यादा की तेज रफ्तार वाले समूह में हैं। कुल आंकड़ों में रिट्रीट रेट लगभग 3.7 से 88 मीटर प्रति वर्ष तक रही।
छोटे ग्लेशियरों पर ज्यादा खतरा
शोधकर्ताओं के मुताबिक छोटे ग्लेशियर जलवायु और स्थानीय परिस्थितियों में बदलाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं। अध्ययन में यह भी बताया गया है कि ग्लेशियर का आकार, ढलान, ऊंचाई, दिशा और मलबे की मात्रा उसके पीछे हटने की गति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए केवल औसत रिट्रीट रेट देखकर सभी ग्लेशियरों की स्थिति को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
ग्लेशियरों की निगरानी क्यों जरूरी?
उत्तराखंड के ग्लेशियर केवल बर्फ के विशाल भंडार नहीं हैं, बल्कि हिमालयी नदियों के जल चक्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में Glacier Recession in Uttarakhand का असर भविष्य में जल उपलब्धता, नदी घाटियों, आपदा प्रबंधन और ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिमों पर पड़ सकता है।
नई स्टडी का निष्कर्ष भी यही बताता है कि भारतीय मध्य हिमालय में ग्लेशियरों के बदलाव को समझने के लिए लंबे समय तक लगातार निगरानी जरूरी है। वैज्ञानिकों ने बेहतर सैटेलाइट डेटा, फील्ड ऑब्जर्वेशन, डिजिटल एलिवेशन मॉडल और अन्य आधुनिक तकनीकों के साथ भविष्य में ग्लेशियरों की स्थिति का अधिक सटीक आकलन करने की जरूरत बताई है।
Glacier Recession in Uttarakhand की यह तस्वीर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां के हिमनद गंगा प्रणाली से जुड़ी प्रमुख नदियों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में स्थित हैं। आने वाले वर्षों में इनके आकार, बर्फ की मात्रा, मास बैलेंस और ग्लेशियल झीलों में होने वाले बदलाव की नियमित निगरानी हिमालयी क्षेत्र की जल और आपदा सुरक्षा के लिहाज से अहम होगी।
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