Bangladesh Hindu killing protest Delhi: दिल्ली की सड़कों पर जो आक्रोश दिखा, वह केवल एक मौत का शोक नहीं था, बल्कि वर्षों से दबाए जा रहे दर्द, गुस्से और सवालों का विस्फोट था। बांग्लादेश में दीपू की मौत ने भारतीय हिंदू समाज को झकझोर कर रख दिया है। राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर इंडिया गेट के आसपास तक उमड़े प्रदर्शनकारियों के चेहरों पर एक ही सवाल साफ दिख रहा था आख़िर कब तक कट्टरपंथ की आग में निर्दोष लोगों की जान जाती रहेगी?

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यह विरोध प्रदर्शन किसी राजनीतिक दल का आयोजन नहीं था, बल्कि आम हिंदू समाज, साधु-संतों, सामाजिक संगठनों और युवाओं की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया थी। हाथों में तख्तियां थीं, जिन पर लिखा था—“दीपू को न्याय दो , कट्टरपंथ मुर्दाबाद, और हिंदुओं की हत्या बंद करो । नारे सिर्फ़ गुस्से के नहीं थे, बल्कि चेतावनी के भी थे। लोगों का कहना था कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हो रहे हमलों को अब ‘आंतरिक मामला’ कहकर टाला नहीं जा सकता।
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प्रदर्शनकारियों ने कट्टरपंथी ताकतों पर तीखा कटाक्ष करते हुए कहा कि जो लोग मजहब के नाम पर हिंसा को जायज़ ठहराते हैं, वे न इंसानियत के पक्ष में हैं और न ही किसी धर्म के। अगर मजहब सिखाता है नफ़रत, तो फिर वह मजहब नहीं, सत्ता का हथियार है यह पंक्ति कई तख्तियों पर लिखी दिखी। दीपू की मौत को एक ‘आकस्मिक घटना’ बताने की कोशिशों पर भी लोगों ने सवाल उठाए और कहा कि यह उस मानसिकता का नतीजा है, जो हिंदुओं को दूसरे दर्जे का नागरिक मानती है।

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भीड़ में मौजूद युवाओं का गुस्सा सबसे ज़्यादा मुखर था। उनका कहना था कि सोशल मीडिया पर मानवाधिकार का ज्ञान बांटने वाले तथाकथित सेक्युलर और अंतरराष्ट्रीय संगठन तब क्यों खामोश हो जाते हैं, जब पीड़ित हिंदू होता है। कट्टरपंथियों पर सीधा कटाक्ष करते हुए एक वक्ता ने कहा, तुम्हारी दाढ़ी, तुम्हारे नारे और तुम्हारी हिंसा तीनों मिलकर यह साबित करते हैं कि तुम्हें न खुदा से प्यार है, न इंसान से।
प्रदर्शन के दौरान कई वक्ताओं ने यह भी कहा कि यह केवल बांग्लादेश की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में हिंदुओं के खिलाफ बढ़ती असहिष्णुता का संकेत है। दीपू की मौत को प्रतीक बनाकर लोगों ने मांग की कि भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को मजबूती से उठाए और बांग्लादेश सरकार पर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का दबाव बनाए।
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दिल्ली की सड़कों पर उमड़ा यह आक्रोश शांतिपूर्ण था, लेकिन संदेश बेहद सख़्त। यह साफ कर दिया गया कि हिंदू समाज अब चुप रहने के मूड में नहीं है। कट्टरपंथियों को चेतावनी देते हुए कहा गया कि नफ़रत की राजनीति ज़्यादा दिन नहीं चलती और निर्दोषों के खून से लिखी गई इबारत अंततः खुद अपने ही हाथ जला देती है।
दीपू की मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दुनिया का मानवाधिकार विवेक चुनिंदा है? दिल्ली का यह प्रदर्शन सिर्फ़ शोक नहीं, बल्कि संकल्प था—कि जहां भी हिंदुओं पर अत्याचार होगा, उसकी गूंज अब सीमाओं में कैद नहीं रहेगी।
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