Haryana Roadways Conductor Case: Punjab and Haryana High Court dismisses appeal in 36-year-old ₹108 revenue loss dispute.
Haryana Roadways Conductor Case: सरकारी खजाने को हुए महज 108 रुपये के कथित नुकसान से शुरू हुआ एक विवाद आखिरकार 36 साल बाद अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा रोडवेज के पूर्व कंडक्टर राम कुमार की अपील को खारिज करते हुए विभागीय कार्रवाई को सही ठहराया है। यह मामला सिर्फ 108 रुपये के राजस्व नुकसान का नहीं था, बल्कि सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही, विभागीय जांच और न्यायिक प्रक्रिया की लंबी यात्रा का भी उदाहरण बन गया।
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1989 में शुरू हुई थी 108 रुपये के मामले की कहानी
Haryana Roadways Conductor Case का यह पूरा मामला वर्ष 1989 का है। उस समय राम कुमार हरियाणा रोडवेज के जींद डिपो में कंडक्टर के पद पर कार्यरत थे। विभागीय निरीक्षण के दौरान आरोप लगा कि उन्होंने बस में कुछ यात्रियों को बिना वैध टिकट यात्रा करने की अनुमति दी। जांच अधिकारियों के अनुसार इस कथित लापरवाही के कारण सरकार को 108 रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ।
निरीक्षण टीम ने पाया कि बस में कुछ यात्री बिना टिकट सफर कर रहे थे। विभाग ने इसे केवल राजस्व हानि का मामला नहीं माना, बल्कि सरकारी नियमों और कर्तव्यों के उल्लंघन के रूप में देखा। इसी आधार पर कंडक्टर के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई।
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विभागीय कार्रवाई में क्या हुआ?
Haryana Roadways Conductor Case की जांच पूरी होने के बाद हरियाणा रोडवेज ने मार्च 1990 में राम कुमार के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की। विभाग ने उनकी एक वार्षिक वेतन वृद्धि को स्थायी प्रभाव से रोक दिया। इसके अलावा निलंबन अवधि के दौरान मिलने वाले वेतन और भत्तों में भी कटौती की गई।
राम कुमार का दावा था कि उनके साथ न्याय नहीं हुआ और विभागीय जांच प्रक्रिया में कई खामियां थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच रिपोर्ट उन्हें समय पर उपलब्ध नहीं कराई गई और उन्हें अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखने का पूरा अवसर नहीं मिला।
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ट्रायल कोर्ट ने कंडक्टर को दी थी राहत
विभागीय स्तर पर राहत न मिलने के बाद Haryana Roadways Conductor Case में राम कुमार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। लंबी सुनवाई के बाद वर्ष 1996 में जींद की ट्रायल कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया।
ट्रायल कोर्ट ने माना कि विभागीय जांच प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया था। अदालत के अनुसार जांच रिपोर्ट कर्मचारी को उपलब्ध नहीं कराई गई थी, जिससे वह प्रभावी ढंग से अपना बचाव नहीं कर सके। इसी आधार पर विभागीय दंड को रद्द कर दिया गया।
उस समय ऐसा लग रहा था कि राम कुमार की कानूनी लड़ाई समाप्त हो जाएगी, लेकिन मामला यहीं नहीं रुका।
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जिला न्यायाधीश की अदालत ने पलट दिया फैसला
Haryana Roadways Conductor Case को लेकर हरियाणा सरकार ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए जिला न्यायाधीश की अदालत में अपील दायर की। वर्ष 1999 में जिला न्यायाधीश ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को पलट दिया।
अदालत ने माना कि विभागीय कार्रवाई कानूनी रूप से उचित थी और जांच प्रक्रिया में कोई गंभीर त्रुटि नहीं थी। इसके साथ ही राम कुमार के खिलाफ लगाया गया दंड फिर से प्रभावी हो गया। यहीं से यह मामला और लंबी न्यायिक प्रक्रिया में प्रवेश कर गया।
36 साल बाद हाईकोर्ट ने सुनाया अंतिम फैसला
Haryana Roadways Conductor Case में जिला अदालत के फैसले के खिलाफ राम कुमार ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में दूसरी अपील दायर की। यह अपील कई वर्षों तक लंबित रही और अंततः 2025-26 में इस मामले पर अंतिम निर्णय आया।
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न्यायमूर्ति सुदीप्ति शर्मा की पीठ ने रिकॉर्ड का विस्तृत अध्ययन करने के बाद पाया कि विभागीय जांच रिपोर्ट और कारण बताओ नोटिस कर्मचारी को उपलब्ध कराए गए थे। इतना ही नहीं, राम कुमार ने उन पर अपना जवाब भी प्रस्तुत किया था।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं हुआ है और विभागीय प्रक्रिया वैधानिक रूप से सही थी। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी।
बस में क्षमता से अधिक यात्री भी थे सवार
Haryana Roadways Conductor Case में सुनवाई के दौरान अदालत के सामने एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। रिकॉर्ड के अनुसार निरीक्षण के समय बस में लगभग 70 यात्री सवार थे, जबकि बस की निर्धारित क्षमता इससे करीब 18 यात्रियों कम थी।
विभागीय अपील के दौरान स्वयं राम कुमार ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया था। अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य विभागीय कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब रिकॉर्ड में पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं और जांच प्रक्रिया भी नियमों के अनुरूप हुई है, तब न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं बनती।
108 रुपये से शुरू हुआ मामला बना मिसाल
Haryana Roadways Conductor Case का यह मामला भारतीय न्यायिक व्यवस्था में उन मामलों की सूची में शामिल हो गया है जो अपेक्षाकृत छोटी राशि से शुरू होकर दशकों तक अदालतों में चलते रहे। 108 रुपये के कथित नुकसान से शुरू हुआ विवाद 36 वर्षों तक विभिन्न अदालतों में सुनवाई का विषय बना रहा।
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हालांकि राशि बेहद कम थी, लेकिन अदालतों के लिए मुद्दा केवल पैसों का नहीं था। मामला सरकारी कर्मचारी की जिम्मेदारी, विभागीय अनुशासन और प्रशासनिक प्रक्रिया की वैधता से जुड़ा था। यही कारण रहा कि मामला लगातार विभिन्न स्तरों की अदालतों में सुनवाई के बाद अंततः हाईकोर्ट के अंतिम फैसले तक पहुंचा।
36 साल लंबी चली इस कानूनी लड़ाई का अंत पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले के साथ हो गया। अदालत ने साफ कर दिया कि विभागीय जांच और दंड प्रक्रिया कानून के अनुरूप थी। इस तरह 108 रुपये के राजस्व नुकसान से शुरू हुआ विवाद आखिरकार समाप्त हो गया, लेकिन यह मामला सरकारी सेवा, जवाबदेही और न्यायिक प्रक्रिया की लंबी यात्रा का एक अनोखा उदाहरण बनकर जरूर याद रखा जाएगा।
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