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Home - Sanatan Vimarsh aur Media: देवकीनंदन ठाकुर के वक्तव्यों को लेकर चयनात्मक बहस क्यों ?

AasthaMathura Vrindavanहोम

Sanatan Vimarsh aur Media: देवकीनंदन ठाकुर के वक्तव्यों को लेकर चयनात्मक बहस क्यों ?

टीआरपी की दौड़ में दबता सनातन, कैमरे में सिर्फ़ विवाद

Last updated: जनवरी 13, 2026 3:44 अपराह्न
KARTIK SHARMA - Sub Editor Published जनवरी 13, 2026
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Indian media debate on Sanatan Dharma and Devkinandan Thakur statements
जब सनातन पर संवाद होता है तो विवाद क्यों खोजा जाता है? मीडिया की प्राथमिकताओं और देवकीनंदन ठाकुर के वक्तव्यों के बहाने एक ज़रूरी विमर्शEditorial Desk
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Highlights
  • जहां विचार होना चाहिए, वहाँ तमाशा बना देता है मीडिया
  • सनातन पर सवाल, लेकिन सभ्यता पर मौन क्यों?
  • मीडिया तय कर रहा है क्या बोलना ‘सही’ और क्या ‘विवाद’
  • धर्माचार्य बोलें तो हेडलाइन, विचार बोलें तो साइलेंस
  • चौथा स्तंभ या टीआरपी का औज़ार? यही असली बहस है

Sanatan Vimarsh aur Media: आज के समय में भारतीय मीडिया एक अजीब द्वंद्व से गुजर रही है। एक तरफ़ वह खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताती है, दूसरी तरफ़ उसकी प्राथमिकताएं अक्सर टीआरपी, क्लिक और वायरल बहसों तक सिमटती दिखती हैं। यही कारण है कि कुछ विषयों को बार-बार उछाला जाता है, जबकि कई गंभीर, संवेदनशील और सभ्यतागत मुद्दे जानबूझकर हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं।

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जब कोई धर्माचार्य इतिहास, संस्कृति या सभ्यता के संदर्भ में बात करता है खासतौर पर सनातन परंपरा से जुड़ा कोई संत तो कुछ चैनलों के लिए वह विवाद बन जाता है। लेकिन वही धर्माचार्य जब ज्ञान, भक्ति, नीति, समाज सुधार या अखंड भारत जैसे विचार रखते हैं, तो वह मीडिया के कैमरों से लगभग गायब हो जाते हैं। सवाल यह है कि ऐसा क्यों?

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इतिहास का उल्लेख या साजिश का शोर?

भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तीनों एक ही ऐतिहासिक भूभाग से निकले हैं। यह तथ्य न तो नया है, न ही किसी एक धर्माचार्य की खोज। इतिहासकार, अकादमिक और दस्तावेज़ यह स्पष्ट करते हैं कि विभाजन से पहले यह पूरा क्षेत्र सांस्कृतिक, सामाजिक और पारिवारिक रूप से जुड़ा हुआ था। समय के साथ, राजनीतिक परिस्थितियों, आक्रांताओं और सत्ता समीकरणों के चलते धर्मांतरण हुए कहीं दबाव में, कहीं परिस्थितियों में, कहीं व्यक्तिगत आस्था के नाम पर।

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जब कोई संत इस ऐतिहासिक सच्चाई का उल्लेख करता है, तो कुछ चैनल उसे इस तरह पेश करते हैं मानो कोई नफरत फैलाने की साजिश रची जा रही हो। शब्दों को काट-छांट कर, संदर्भ से अलग करके “ब्रेकिंग” बना दी जाती है। बहसें सजाई जाती हैं, पैनल बिठाए जाते हैं, और फिर तय नैरेटिव के मुताबिक फैसला सुना दिया जाता है।

सनातन की बात, टीआरपी का नुकसान?

यह भी एक कड़वा सच है कि जब कोई धर्माचार्य सनातन दर्शन, वेद, उपनिषद, गीता, या भारतीय ज्ञान परंपरा की बात करता है तो वह टीआरपी का विषय नहीं बनता। अखंड भारत की अवधारणा, जो सांस्कृतिक एकता की बात करती है, उसे “राजनीतिक एजेंडा” कहकर खारिज कर दिया जाता है। लेकिन वही मीडिया जब किसी सनसनीखेज बयान, आधे-अधूरे वीडियो क्लिप या उकसावे वाली लाइन को पकड़ लेती है, तो उसे घंटों घुमाया जाता है। यहां प्रश्न धर्म का नहीं, चयनात्मक नजरिये का है।

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पड़ोसी देशों में अत्याचार, लेकिन कैमरे बंद

आज भी पाकिस्तान में मंदिरों को तोड़ा जाना, जबरन धर्मांतरण, और अल्पसंख्यक हिंदुओं की स्थिति कोई छुपी हुई बात नहीं है। बांग्लादेश में भी समय-समय पर हिंदू समुदाय, मठों और धर्माचार्यों पर कार्रवाई की खबरें आती रही हैं। कई मामलों में धर्माचार्यों की गिरफ्तारी, मंदिरों पर हमले और सामाजिक उत्पीड़न की घटनाएं दर्ज हैं। लेकिन ये मुद्दे मीडिया के लिए प्राइम टाइम नहीं बनते। न वहां डिबेट होती है, न स्टूडियो गरम होता है। शायद इसलिए क्योंकि इन खबरों से टीआरपी का तड़का नहीं लगता, या फिर यह विमर्श असहज सवाल खड़े कर देता है।

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देवकीनंदन ठाकुर का पक्ष क्यों ज़रूरी है

देवकीनंदन ठाकुर जैसे धर्माचार्य वर्षों से कथा मंचों से समाज को जोड़ने, सनातन मूल्यों को सरल भाषा में समझाने और सांस्कृतिक चेतना जगाने का काम कर रहे हैं। उनकी कथाएं केवल भक्ति तक सीमित नहीं होतीं वे समाज, इतिहास, नीति और राष्ट्रबोध से भी जुड़ती हैं। जब वह अखंड भारत या सभ्यतागत एकता की बात करते हैं, तो वह किसी देश की सीमाओं को मिटाने की घोषणा नहीं करते, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति की बात करते हैं। जब वह इतिहास का उल्लेख करते हैं, तो उसका उद्देश्य नफरत नहीं, बल्कि स्मरण और आत्मबोध होता है। मीडिया का काम यह होना चाहिए कि वह ऐसे वक्तव्यों को पूरे संदर्भ में समझे और समझाए न कि उन्हें काटकर विवाद का ईंधन बनाए।

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हल्का कटाक्ष, गहरा सवाल

यह विडंबना ही है कि आज ज्ञान से ज़्यादा शोर बिकता है। व्याख्या से ज़्यादा टकराव चलता है। और संतुलन से ज़्यादा “सनसनी”। ऐसे में धर्माचार्यों की बात को समझने की जगह, उन्हें कठघरे में खड़ा कर देना आसान हो जाता है। मीडिया अगर सचमुच समाज का दर्पण है, तो उसे यह भी दिखाना होगा कि पड़ोसी देशों में क्या हो रहा है, सनातन परंपरा क्या कहती है, और धर्माचार्य किस संदर्भ में बोल रहे हैं। केवल टीआरपी के चश्मे से देखने पर तस्वीर अधूरी ही नहीं, भ्रामक भी हो जाती है।

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विमर्श का स्तर तय करना होगा

यह लेख किसी एक चैनल या व्यक्ति पर आरोप नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति पर सवाल है। सनातन, इतिहास और धर्माचार्यों से जुड़ा विमर्श भावनाओं से नहीं, तथ्यों और संदर्भों से होना चाहिए। देवकीनंदन ठाकुर जैसे संतों की बात को सुनना, समझना और फिर आलोचना या समर्थन करना यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। टीआरपी आएगी और जाएगी, लेकिन सभ्यता की स्मृति और समाज की दिशा तय करने वाले सवाल बने रहते हैं। अब यह मीडिया पर है कि वह किसे प्राथमिकता देती है क्षणिक शोर को या स्थायी सत्य को।

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