Pakistan International Airlines Privatization Crisis: कंगाल पाकिस्तान एक बार फिर दुनिया के सामने अपनी बदहाली का ऐसा तमाशा बना है, जिसे देखकर सिर्फ अफसोस नहीं बल्कि एक कड़वी हंसी भी आती है। जिस देश ने कभी खुद को इस्लामिक वर्ल्ड की ताकत बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी, वही पाकिस्तान आज अपने ही राष्ट्रीय प्रतीकों की नीलामी करता फिर रहा है। हालात इतने शर्मनाक हो चुके हैं कि अब सरकार को अपनी सरकारी एयरलाइन पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस यानी PIA को बेचकर यह साबित करना पड़ रहा है कि उसके पास गर्व बचा है या नहीं। यह सौदा कोई साधारण आर्थिक फैसला नहीं है, बल्कि दशकों की नीतिगत विफलताओं, सेना-परस्त राजनीति और आतंक-आधारित सोच का लिखित स्वीकारनामा है।
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आज का बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी देश की संप्रभुता और प्रतिष्ठा इतनी सस्ती हो सकती है कि उसे टुकड़ों में बेचकर सरकारें अपनी नाकामी छिपाने लगें? क्या यही वो पाकिस्तान है, जो भारत को हर मंच पर आंख दिखाने की कोशिश करता रहा? टीवी टुडे भारत के दर्शक यह सवाल जरूर पूछ रहे होंगे कि जब अपने घर की हालत इतनी खराब हो, तो पड़ोसी पर पत्थर फेंकने की हिम्मत कहां से आती है।
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135 अरब पाकिस्तानी रुपये में PIA का बिकना सिर्फ एक बिजनेस डील नहीं है, बल्कि उस सिस्टम का पोस्टमार्टम है जो बरसों से कर्ज, कट्टरपंथ और सैन्य दखल पर जिंदा रहा। IMF के दरवाजे पर बार-बार कटोरा लेकर जाना, सऊदी अरब और चीन से मदद की गुहार लगाना और फिर भी हालात न सुधरना—यह सब पाकिस्तान की आर्थिक नाकामी की लंबी कहानी है। जब जेब खाली हो जाए, तो सबसे पहले घर के गहने बिकते हैं। पाकिस्तान के मामले में ये गहने “राष्ट्रीय धरोहर” कहलाने वाली संस्थाएं हैं।
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सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे निजीकरण ड्रामे को पाकिस्तान सरकार ने पारदर्शिता का तमगा देने के लिए टीवी पर लाइव दिखाया। मानो यह कोई उपलब्धि हो, कोई जश्न हो। लेकिन असल में यह लाइव टेलीकास्ट पाकिस्तान की मजबूरी का सीधा प्रसारण था। जिस एयरलाइन के नाम के आगे “इंटरनेशनल” जुड़ा है, उसकी हालत यह थी कि जहाज उड़ने से पहले ही तकनीकी खराबी का शिकार हो जाते थे, कर्मचारियों को महीनों तक सैलरी नहीं मिलती थी और यूरोप जैसे देशों ने सुरक्षा कारणों से उस पर बैन लगा दिया था। सवाल यह है कि ऐसी एयरलाइन को बेच देना क्या सुधार कहलाएगा या फिर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना?
बिडिंग प्रक्रिया में आरिफ हबीब ग्रुप, लकी सीमेंट और एयरब्लू जैसे स्थानीय खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। आखिरकार 135 अरब रुपये की बोली लगाकर आरिफ हबीब ग्रुप विजेता बना। सरकार ने पहले 100 अरब रुपये का रेफरेंस प्राइस तय किया था, लेकिन जब बोली थोड़ी ऊपर गई तो इसे “सफलता” बताकर पेश किया गया। अब जरा हिसाब लगाइए एक राष्ट्रीय एयरलाइन, जो कभी पाकिस्तान की पहचान थी, उसकी कीमत कुछ सौ करोड़ भारतीय रुपये के बराबर रह जाए और फिर उसे उपलब्धि बताया जाए। यह उपलब्धि नहीं, यह मजबूरी की सबसे ऊंची आवाज है।
शहबाज शरीफ सरकार कह रही है कि 75 फीसदी हिस्सेदारी बेचकर एयरलाइन को बचाने का रास्ता खोला गया है और बाकी 25 फीसदी शेयर भी 90 दिनों के भीतर खरीदे जा सकते हैं। साथ ही निवेशक को अगले पांच साल में 80 अरब रुपये का निवेश करना होगा। कागजों में यह सब बहुत सुंदर लगता है। लेकिन पाकिस्तान का इतिहास गवाह है कि वहां योजनाएं अक्सर प्रेस रिलीज़ और फाइलों से आगे नहीं बढ़तीं। वहां वादे करना आसान है, निभाना नहीं।
आज का बड़ा सवाल यह भी है कि क्या PIA की बिक्री से पाकिस्तान की आर्थिक रीढ़ मजबूत हो जाएगी? जवाब साफ है नहीं। क्योंकि समस्या सिर्फ एक एयरलाइन की नहीं है, समस्या उस सोच की है जो भारत विरोध, आतंक के इस्तेमाल और सेना की सर्वोच्चता पर टिकी रही। जब देश का बड़ा बजट रक्षा खर्च और पुराने कर्ज चुकाने में चला जाए, जब शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग हाशिए पर हों, तो नतीजा यही निकलता है देश बिकाऊ बन जाता है।
टीवी टुडे भारत के मंच से अगर इसे देखा जाए, तो तस्वीर और भी साफ हो जाती है। भारत में एयर इंडिया का निजीकरण हुआ, लेकिन किसके हाथों? टाटा ग्रुप जैसे विश्वसनीय और अनुभवी औद्योगिक समूह के हाथों। नतीजा यह हुआ कि एयर इंडिया आज विस्तार, आधुनिकीकरण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की राह पर है। नए विमान, नई रूट्स और नई सोच यह है निजीकरण का सकारात्मक मॉडल। वहीं पाकिस्तान में PIA की बिक्री हताशा और लाचारी का प्रतीक बन गई है।
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पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं ने कभी गंभीरता से यह नहीं सोचा कि बिना आर्थिक सुधार, बिना आतंकवाद से दूरी और बिना स्थिर लोकतंत्र के कोई देश आगे नहीं बढ़ सकता। वहां सत्ता का असली केंद्र संसद नहीं बल्कि सेना रही है। नीतियां जनता के लिए नहीं बल्कि सत्ता संतुलन के लिए बनीं। नतीजा यह हुआ कि आज पाकिस्तान अपने ही नागरिकों को यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि एयरलाइन बेचना “रिफॉर्म” है। जबकि सच्चाई यह है कि यह दिवालियेपन की घोषणा के बराबर है।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कैबिनेट बैठक में अधिकारियों को बधाई दी। सवाल यह है कि किस बात की बधाई? उस काम की, जिसमें एक राष्ट्रीय प्रतीक को बेचना पड़ा? या उस नाकामी की, जिसने पाकिस्तान को इस मोड़ पर ला खड़ा किया? अगर बधाई देनी ही थी, तो उन नीतियों को दी जानी चाहिए थी जिन्होंने देश को आत्मनिर्भर बनाया हो। लेकिन वहां तो आत्मनिर्भरता एक खोखला नारा बनकर रह गई है।
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आज का बड़ा सवाल सिर्फ पाकिस्तान के लिए नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए है क्या आतंक और कर्ज पर पलने वाली अर्थव्यवस्थाएं कभी आत्मसम्मान के साथ खड़ी हो सकती हैं? इतिहास कहता है नहीं। भारत ने यह दिखाया है कि लोकतंत्र, विकास और वैश्विक सहयोग से देश मजबूत बनता है। पाकिस्तान ने यह भी दिखा दिया है कि गलत प्राथमिकताएं देश को बिकाऊ बना देती हैं।
PIA की बिक्री पाकिस्तान के लिए कोई चमत्कार नहीं करेगी। यह सिर्फ समय खरीदने की एक असफल कोशिश है। आज एयरलाइन बिकी है, कल बंदरगाह बिकेंगे, परसों कोई और राष्ट्रीय संपत्ति। सवाल यह है कि आखिर कब तक? जब तक नीतियां नहीं बदलेंगी, सोच नहीं बदलेगी और आतंक के रास्ते से मुंह नहीं मोड़ा जाएगा, तब तक पाकिस्तान इसी चक्र में फंसा रहेगा।
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Tv Today Bharat की शैली में कहें तो यह सिर्फ खबर नहीं है, यह चेतावनी है। यह उस आईने की तरह है, जिसमें पाकिस्तान को अपना असली चेहरा दिख रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह इस आईने में झांकने की हिम्मत करेगा? या फिर हमेशा की तरह सच से आंखें चुराकर किसी नई साजिश, किसी नए बहाने की तलाश में निकल पड़ेगा?
आज Tv Today Bharat आत्मविश्वास से भविष्य की ओर देख रहा है। भारत आत्मनिर्भरता, मेक इन इंडिया और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। वहीं कंगाल पाकिस्तान अपने अतीत की गलतियों की कीमत चुका रहा है। आज का बड़ा सवाल यही है क्या पाकिस्तान कभी भारत से कुछ सीखेगा, या यूं ही अपने राष्ट्रीय प्रतीकों को बेचकर दुनिया के सामने अपनी नाकामी का तमाशा बनाता रहेगा? टीवी टुडे भारत के दर्शकों के लिए यह सवाल सिर्फ पड़ोसी देश का नहीं, बल्कि एक सबक है कि गलत रास्ते पर चलने का अंजाम क्या होता है।
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