RSS-backed yatra to save trees near Gangotri: उत्तकाशी के शांत, पवित्र और बेहद संवेदनशील गंगोत्री मार्ग पर जब पर्यावरण को लेकर चिंताएँ बढ़ रही थीं, ठीक उसी समय एक अनोखी यात्रा ने पहाड़ों की धड़कन को फिर से जीवित कर दिया। आरएसएस की पर्यावरण इकाई के समर्थन से शुरू हुई यह 100 सदस्यों की ‘वृक्ष रक्षा यात्रा’ रविवार को हर्सिल में सम्पन्न हुई, और इस यात्रा का दृश्य एक संदेश देता दिखा पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं, हिमालय की सांस हैं। यात्रा के दौरान प्रतिभागियों ने प्राचीन देवदार वृक्षों की पूजा की, उन्हें राखी बांधी और ‘रक्षा सूत्र’ के माध्यम से संरक्षण का संकल्प लिया। ये वही वृक्ष हैं जो सदियों से गंगा तट की रक्षा करते आए हैं, और अब चारधाम सड़क परियोजना के तहत हजारों पेड़ों की कटाई की आशंका ने स्थानीय लोगों, पर्यावरणविदों और समाजिक संगठनों की चिंता बढ़ा दी है।
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कार्यक्रम में मौजूद न होने के बावजूद, बीजेपी के वरिष्ठ नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी और आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारी कृष्ण गोपाल ने वीडियो संदेशों के जरिए अपनी स्पष्ट राय रखी। जोशी ने चेताया, ‘हम विरोधी नहीं हैं सुरक्षा जरूरतों के, लेकिन यदि हिमालय नहीं बचा, तो न अर्थव्यवस्था बचेगी, न कृषि, न देश।‘ उधर कृष्ण गोपाल ने कहा, ‘हिमालय बचेगा तो मानवता बचेगी। ये पेड़ सिर्फ हरियाली नहीं हैं, गंगा की धारा और ग्लेशियरों के प्रहरी हैं।‘ उनकी बातों में वही तीखापन था जो आज के विकास मॉडल के सामने सबसे बड़ा सवाल रखता है क्या चौड़ी सड़कें पहाड़ों की कीमत पर?
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यात्रा से जुड़े पर्यावरण समूह और स्थानीय नागरिक बार-बार एक ही मांग दोहरा रहे हैं ‘विकास चाहिए, लेकिन पहाड़ों की कीमत पर नहीं। अनियंत्रित कटान नहीं, संवेदनशील क्षेत्रों में वैकल्पिक सड़क मॉडल चाहिए।‘ दरअसल, अगस्त में हर्सिल घाटी के धराली क्षेत्र में आए भयावह भूस्खलन, जिसमें 16 लोगों की जान गई, ने इस बहस को और गंभीर बना दिया है। अब जब जला–भैरोंघाटी के बीच 20 किमी मार्ग को और चौड़ा करने की मंजूरी मिल चुकी है, सवाल और गहरा गया है क्या यह क्षेत्र एक और आपदा के मुहाने पर खड़ा है?
पूर्व मंत्री करण सिंह और मुरली मनोहर जोशी पहले ही इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक ले जा चुके हैं। 2021 में कोर्ट ने कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों पर चौड़ीकरण को सुरक्षा कारणों से मंजूरी दी थी। लेकिन अब ‘हिमालय तो हम हैं’ समूह इस फैसले की समीक्षा की मांग कर रहा है। संदेश साफ है हिमालय केवल पर्यटन का स्थल नहीं, भारत की जल, जलवायु और जीवनरेखा है।
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देवदार के पेड़ सिर्फ हरियाली नहीं, बल्कि हिमालय की पारिस्थितिकी का आधार हैं। ग्लेशियर हों, गंगा की धारा हो, या पहाड़ों की स्थिरता सबकी सुरक्षा इन वृक्षों से जुड़ी है। यात्रा ने यही समझाया कि पेड़ों की रक्षा कोई भावनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता है।हर्सिल में समाप्त हुई यह यात्रा एक नई शुरुआत है। यह सिर्फ 100 लोगों का प्रयास नहीं, बल्कि उस आवाज़ का प्रतिध्वनि है जो पूरे भारत में उठ रही है, हिमालय को बचाना ही भारत को बचाना है।
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