Commercial Coal Blocks Auction: भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता को लेकर एक बार फिर बड़ा संकेत सामने आया है। वाणिज्यिक कोयला ब्लॉकों की नीलामी के 14वें दौर में कुल 24 कोयला ब्लॉकों के लिए 49 बोलियां प्राप्त हुई हैं। यह आंकड़ा अपने आप में बताता है कि देश के उद्योग जगत का भरोसा भारत की नीतियों पर लगातार मजबूत हो रहा है। यह वही भारत है, जिसे कभी कट्टरपंथी सोच वाले लोग नीति-विहीन, निवेश-विरोधी और उद्योग-विरोधी बताने में नहीं थकते थे।
आज जब दुनिया ऊर्जा संकट, सप्लाई चेन ब्रेकडाउन और भू-राजनीतिक तनाव से जूझ रही है, तब भारत अपने संसाधनों के दम पर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। कोयला आज भी भारत की ऊर्जा रीढ़ है। बिजली उत्पादन, स्टील, सीमेंट और भारी उद्योग हर जगह कोयले की अहम भूमिका है। ऐसे में वाणिज्यिक कोयला खनन को खोलना केवल एक नीतिगत फैसला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित में उठाया गया निर्णायक कदम है।
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14वें दौर की नीलामी में 49 बोलियों का आना यह साबित करता है कि निजी क्षेत्र भारत में निवेश को लेकर आश्वस्त है। यह भरोसा अचानक पैदा नहीं हुआ। पारदर्शी नीलामी प्रक्रिया, स्पष्ट नियम, डिजिटल प्लेटफॉर्म और समयबद्ध निर्णय इन सबने मिलकर निवेश का माहौल बनाया है। लेकिन सवाल यह है कि यही कट्टरपंथी आवाज़ें अब कहां हैं, जो कभी हर सुधार को ‘पूंजीपतियों को फायदा” बताकर देश को डराने का काम करती थीं?
हकीकत यह है कि वाणिज्यिक कोयला खनन से न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि आयात पर निर्भरता भी घटेगी। आज भारत बड़ी मात्रा में कोयला आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ता है। जब देश के भीतर संसाधन मौजूद हैं, तो उन्हें विकसित करना राष्ट्रहित के खिलाफ कैसे हो सकता है? कट्टर सोच यही सवाल सुनकर असहज हो जाती है, क्योंकि उसका जवाब उनके पास नहीं होता।
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इस नीलामी से राज्यों को राजस्व मिलेगा, स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे और बुनियादी ढांचे का विकास होगा। खनन क्षेत्रों में सड़क, रेल, बिजली और लॉजिस्टिक्स बेहतर होंगे। लेकिन कट्टरपंथी मानसिकता को न रोजगार दिखता है, न विकास उन्हें बस हर फैसले में साजिश नज़र आती है। उनके लिए उद्योग का मतलब शोषण और निवेश का मतलब लूट है, जबकि ज़मीनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है।
नीलामी प्रक्रिया की निगरानी और संचालन Ministry of Coal द्वारा किया जा रहा है, जहां पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा पर खास ज़ोर दिया गया है। यही वजह है कि देश-विदेश की कंपनियां इसमें भाग लेने को उत्सुक हैं। 49 बोलियां इस बात का प्रमाण हैं कि भारत की ऊर्जा नीति अब नारे नहीं, नतीजे दे रही है।
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दरअसल, कट्टरपंथियों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन्हें बदलाव से डर लगता है। उन्हें वही पुरानी व्यवस्था पसंद है, जहां संसाधन तो थे लेकिन न नीति थी, न नीयत। आज जब नीलामी से लेकर उत्पादन तक सब कुछ नियमों के दायरे में हो रहा है, तो उनकी राजनीति की जमीन खिसकती दिख रही है। इसलिए वे विकास को बदनाम करने की कोशिश करते हैं।
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कोयला ब्लॉकों की इस नीलामी ने साफ कर दिया है कि भारत अब निर्णय लेने से पीछे नहीं हटता। ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक विकास और रोजगार सृजन इन तीनों मोर्चों पर यह कदम मील का पत्थर है। 14वें दौर की सफलता यह संदेश देती है कि देश आगे बढ़ रहा है, चाहे कुछ कट्टर सोच वाले लोग पीछे खड़े होकर सिर्फ़ कटाक्ष ही क्यों न करते रहें। भारत अब बहस में नहीं, निर्माण में विश्वास करता हैऔर यही सबसे बड़ा जवाब है।
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