16 Shringar items including sindoor bangles mehndi and anklets on Hartalika Teej
16 Shringar: हरतालिका तीज हिंदू धर्म के प्रमुख व्रतों में से एक है, जिसे खासतौर पर सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना के लिए करती हैं। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। पूजा के दौरान महिलाएं स्वयं भी श्रृंगार करती हैं और माता पार्वती को भी श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करती हैं। धार्मिक परंपरा में इसे 16 Shringar कहा जाता है।
16 Shringar को सिर्फ सजने-संवरने से जोड़कर नहीं देखा जाता। सनातन परंपरा में इसकी प्रत्येक वस्तु को सौभाग्य, समृद्धि, सुंदरता और सकारात्मकता से जोड़ा गया है। यही वजह है कि हरतालिका तीज की पूजा में इसका विशेष स्थान माना जाता है।
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हरतालिका तीज पर 16 श्रृंगार का क्या महत्व है?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। लंबे तप और समर्पण के बाद उनका विवाह भगवान शिव से हुआ। इसी वजह से हरतालिका तीज को माता पार्वती के समर्पण और तपस्या से जोड़कर देखा जाता है।
विवाहित महिलाएं इस दिन माता पार्वती से अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। 16 Shringar इसी सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। पूजा के समय इन वस्तुओं को माता पार्वती को अर्पित करने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है।
सिंदूर और बिंदी का खास स्थान
16 श्रृंगार में सिंदूर को सबसे महत्वपूर्ण सुहाग सामग्री में शामिल किया जाता है। विवाहित महिलाएं मांग में सिंदूर लगाती हैं और इसे पति की लंबी उम्र तथा वैवाहिक सौभाग्य का प्रतीक मानती हैं। इसी तरह माथे पर लगाई जाने वाली बिंदी को भी श्रृंगार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
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हरतालिका तीज पर माता पार्वती को सिंदूर, कुमकुम और बिंदी अर्पित करने की परंपरा कई घरों में निभाई जाती है। भक्तिभाव से की गई इस पूजा के पीछे माता पार्वती के प्रति श्रद्धा और उनके वैवाहिक जीवन को आदर्श मानने की भावना जुड़ी होती है।
चूड़ियां और मेहंदी क्यों हैं खास?
16 Shringar में चूड़ियों का भी विशेष महत्व माना जाता है। खासकर हरी, लाल या कांच की चूड़ियों को सुहाग और खुशहाली से जोड़ा जाता है। हरतालिका तीज के अवसर पर महिलाएं हाथों में चूड़ियां पहनकर माता पार्वती की पूजा करती हैं।
मेहंदी को भी शुभता और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। तीज से पहले महिलाएं हाथों और पैरों पर मेहंदी लगाती हैं। कई स्थानों पर यह उत्सव का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। मेहंदी की गहरी रंगत को लेकर अलग-अलग लोक मान्यताएं भी प्रचलित हैं।
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पायल और बिछिया का भी है महत्व
पैरों में पहनी जाने वाली पायल और बिछिया भी पारंपरिक 16 Shringar का हिस्सा मानी जाती हैं। भारतीय संस्कृति में इन्हें विवाहित महिलाओं के श्रृंगार से जोड़ा गया है। पूजा के दौरान माता पार्वती को पायल और बिछिया अर्पित करने की परंपरा भी कुछ क्षेत्रों में देखने को मिलती है। हालांकि इन वस्तुओं के धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थ अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में अलग हो सकते हैं। इसलिए हर जगह 16 श्रृंगार की सूची एक जैसी हो, यह जरूरी नहीं है।
16 श्रृंगार की वस्तुओं में क्या-क्या शामिल होता है?
परंपरागत रूप से 16 Shringar में सिंदूर, बिंदी, काजल, मेहंदी, चूड़ियां, मंगलसूत्र, नथ, झुमके या कर्णफूल, हार, बाजूबंद, कमरबंद, अंगूठी, पायल, बिछिया, गजरा और वस्त्र जैसे सामान शामिल किए जाते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी सूची और नामों में थोड़ा अंतर मिल सकता है।
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इन सभी वस्तुओं को मिलाकर महिला के पारंपरिक श्रृंगार की पूर्णता मानी जाती है। हरतालिका तीज पर महिलाएं अपनी परंपरा के अनुसार इन वस्तुओं से सजती हैं और फिर भगवान शिव तथा माता पार्वती का पूजन करती हैं।
क्या 16 श्रृंगार का ग्रहों से भी संबंध है?
ज्योतिष और लोक मान्यताओं में 16 Shringar की वस्तुओं को ग्रहों और सकारात्मक ऊर्जा से जोड़ने वाली धारणाएं भी मिलती हैं। हालांकि इनका वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रृंगार की अलग-अलग वस्तुएं मन, शरीर और वातावरण में सकारात्मकता का प्रतीक मानी जाती हैं।

इसी भावना के साथ महिलाएं हरतालिका तीज पर सजकर पूजा में शामिल होती हैं। इसका मुख्य उद्देश्य बाहरी सुंदरता के बजाय श्रद्धा, आत्मविश्वास और सौभाग्य की भावना से जुड़ा माना जाता है।
माता पार्वती और भगवान शिव के प्रेम का प्रतीक
हरतालिका तीज पर 16 Shringar का सबसे महत्वपूर्ण पहलू माता पार्वती और भगवान शिव के दांपत्य जीवन से जुड़ी आस्था है। माता पार्वती को समर्पण, तपस्या और दृढ़ संकल्प का प्रतीक माना जाता है। इसलिए महिलाएं उनके स्वरूप का ध्यान करते हुए अपने वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और सुख की कामना करती हैं।
हरतालिका तीज पर 16 श्रृंगार केवल सजने-संवरने की परंपरा नहीं है बल्कि यह भारतीय संस्कृति में स्त्री के सौभाग्य, वैवाहिक जीवन, आत्मसम्मान और धार्मिक आस्था से जुड़ी एक पुरानी परंपरा है। क्षेत्र और परिवार के अनुसार इसकी विधि अलग हो सकती है, लेकिन माता पार्वती के प्रति श्रद्धा और सुखी दांपत्य की कामना इसका मूल भाव माना जाता है।
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