PM Narendra Modi engages in global diplomatic meetings on human-centric technology and IBSA cooperation during G20 Summit Johannesburg.
India at G20 Johannesburg: जोहांसबर्ग में हुए G20 शिखर सम्मेलन के तीसरे सत्र ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न को केंद्र में रखा दुनिया का भविष्य किस दिशा में जा रहा है? और उस भविष्य के निर्माण में भारत की क्या भूमिका है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने वक्तव्य में जिस ‘मानव-केन्द्रित तकनीक’ की बात कही, उसकी ध्वनि सिर्फ शिखर सम्मेलन के हॉल तक सीमित नहीं रही। यह एक स्पष्ट संकेत था कि आने वाला समय उन देशों का होगा जो तकनीक को लोक-कल्याण से जोड़ेंगे, न कि केवल वित्तीय बाजारों, रणनीतिक नियंत्रण या विशिष्ट क्लबों के अधिकार तक सीमित रखेंगे।

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मोदी ने कहा कि तकनीक ‘फाइनेंस सेंट्रिक नहीं, ह्यूमन सेंट्रिक होनी चाहिए’, और भारत इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है UPI के रूप में डिजिटल भुगतान की क्रांति हो, अंतरिक्ष में भारतीय निजी स्टार्ट-अप्स की दस्तक हो, या AI में लोक-आधारित सक्षम विकास भारत इस दिशा में दुनिया को वास्तविक मॉडल प्रदान कर रहा है। यहां संदेश स्पष्ट था भारत अब केवल दूसरी पंक्ति का श्रोता नहीं, बल्कि प्रथम पंक्ति का वक्ता है जो दुनिया की तकनीकी-नीति का स्वर निर्धारित कर रहा है।

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भारत-जापान: तकनीक, रक्षा और प्रतिभा एक साझा भविष्य
जोहांसबर्ग में जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची से मोदी की मुलाक़ात इस पूरे दौर में सबसे अर्थपूर्ण संवादों में से रही। भारत-जापान संबंध पहले भी मज़बूत रहे हैं, लेकिन इस भेंट के बाद एक नया आयाम जुड़ गया टैलेंट मोबिलिटी का। जापान जिस जनसंख्या-संकट से जूझ रहा है और भारत जिस डेमोग्राफिक-डिविडेंड का वाहक है दोनों देशों के भविष्य के संयुक्त समीकरण में यही एक निर्णायक पुल बन सकता है। रक्षा क्षेत्र विशेषकर समुद्री सुरक्षा दोनों देशों के बीच नया साझा निवेश स्थल भी बन रहा है। यह मुलाकात केवल शिष्टाचार नहीं थी यह ‘एशियाई साझेदारी’ के नए प्रतिमान की नींव थी।

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आईएमएफ प्रमुख से मुलाक़ात, भारत की आर्थिक विश्वसनीयता की स्वीकृति
IMF की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा से मोदी की भेंट को केवल एक औपचारिक बातचीत के रूप में देखना भूल होगी। यह मुलाकात उस विश्वास का संकेत थी जो वैश्विक वित्तीय संस्थान भारत की स्थिरता, आर्थिक संरचना और विकास-मॉडल के प्रति व्यक्त कर रहे हैं। क्रिस्टालिना पहले भी कह चुकी हैं कि भारत ‘विश्व अर्थव्यवस्था के लिए निर्णायक इंजन है और यह संवाद उसी विश्वास की आगे बढ़ती कड़ी था। भारत ने दिखाया है कि बड़े निर्णय केवल GDP से नहीं, बल्कि जमीनी सामाजिक-आर्थिक क्रियाशीलता से तय होते हैं।

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IBSA: तीन महाद्वीप, तीन लोकतंत्र, एक दक्षिणी ध्वज
G20 के भीतर IBSA यानी भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका का मंच मोदी, लूला दा सिल्वा और सिरिल रामाफोसा की संयुक्त उपस्थिति में एक अलग ही संदेश दे गया।मोदी के शब्दों में IBSA सिर्फ एक समूह नहीं, तीन महाद्वीपों के लोकतांत्रिक संवाद और दक्षिणी देशों की आवाज़ का मंचहै।

IBSA का अर्थ है
- एक अफ्रीकी दृष्टि,
- एक लैटिन अमेरिकी समझ,
- एक दक्षिण एशियाई ऊर्जा
मिलकर वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया का वैकल्पिक नैरेटिव बनाती हैं। यह ‘ग्लोबल साउथ’ की वकालत नहीं उसकी गरिमा की पुनर्स्थापना है।
नीदरलैंड के प्रधानमंत्री डिक स्कूफ के साथ संवाद, जल, ऊर्जा और नवाचार की धुरी
नीदरलैंड एक ऐसा देश जिसने पानी को दुश्मन नहीं, संसाधन मानकर जीना सीखा। और भारत जहां जल-प्रबंधन आने वाले दशकों की चुनौती है। जोहांसबर्ग में मोदी और डच प्रधानमंत्री डिक स्कूफ की बातचीत इस संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण रही।

द्विपक्षीय सहयोग के प्रमुख क्षेत्र
- जल संसाधन प्रबंधन
- हाई-टेक नवाचार
- ऊर्जा परिवर्तन
- कृषि-तकनीक
- व्यापार और निवेश
मुलाकात का आशय स्पष्ट था कि, यूरोप का अनुभव और भारत का पैमाना मिलकर एक नया विकास-सूत्र रच सकते हैं। स्कूफ के साथ संवाद में दिखाई दिया कि भारत और नीदरलैंड का संबंध अब कूटनीतिक औपचारिकता से आगे बढ़कर तकनीकी-मानवीय साझेदारी का रूप ले चुका है।
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भारत का उभरता वैश्विक व्यक्तित्व, दर्शक से निर्माता तक
इन सभी मुलाक़ातों, भाषणों और संवादों का साझा भाव यह है कि भारत अब,
- वैश्विक राजनीति का मौन दर्शक नहीं
- तकनीकी-नैतिकता का परिभाषक
- आर्थिक विमर्श का विश्वसनीय केंद्र
- लोकतांत्रिक दक्षिण की आवाज़
- एशिया की रणनीतिक शक्ति
- और यूरोपीय सहयोगों का भविष्य साझेदार
बन चुका है। जोहांसबर्ग शिखर सम्मेलन में भारत का स्वर केवल कूटनीति नहीं था वह 21वीं सदी के विकास-मॉडल की राजनीतिक भाषा थी।
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एक बदलता हुआ भारत, एक सुनता हुआ विश्व
दुनियाभर के नजरिये से देखा जाये, तो जोहांसबर्ग केवल एक शिखर सम्मेलन नहीं था। यह दृश्य था कि दुनिया बदल रही है और भारत अब उसके केंद्र में है। भारत ने जो भाषा बोली वह केवल तकनीक की भाषा नहीं थी, वह लोकतंत्र की भाषा थी, वह साझेदारी की भाषा थी, और वह भविष्य की भाषा थी।दुनिया के पुराने सूत्र थे ताक़त, पूँजी और नियंत्रण। भारत का नया सूत्र है विश्वास, तकनीक और मानव-केन्द्रित विकास। यही भारत की नई वैश्विक पहचान है पहचान जो अब दुनिया देख रही है, सुन रही है, और स्वीकार कर रही है।
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