51 Years of Emergency: Indira Gandhi during the 1975 Emergency political crisis after the Allahabad High Court verdict
51 Years of Emergency: 12 जून 1975… भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की वह तारीख, जिसने देश की राजनीति की दिशा बदल दी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रायबरेली लोकसभा चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी ठहराते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया। साथ ही छह वर्षों तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। यह फैसला केवल एक सांसद के चुनाव को रद्द करने का मामला नहीं था, बल्कि सीधे देश के प्रधानमंत्री की संवैधानिक और राजनीतिक वैधता पर सवाल था। यहीं से शुरू हुई सत्ता बचाने की सबसे बड़ी राजनीतिक जंग।

51 Years of Emergency: अदालत के फैसले ने हिला दी सत्ता
समाजवादी नेता राजनारायण ने 1971 के चुनाव परिणाम को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। लंबी सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने फैसला सुनाया कि चुनाव प्रचार के दौरान सरकारी अधिकारी की सेवाओं का उपयोग किया गया, जो चुनावी कानून का उल्लंघन था।
इस फैसले के बाद इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता समाप्त हो गई। राजनीतिक रूप से यह उनके लिए सबसे बड़ा संकट था। देशभर में विपक्ष ने इस्तीफे की मांग तेज कर दी। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन और अधिक आक्रामक हो गया। कांग्रेस के भीतर भी बेचैनी बढ़ने लगी।
51 Years of Emergency: सामने थे दो रास्ते
फैसले के बाद इंदिरा गांधी के सामने दो स्पष्ट विकल्प थे। पहला, सुप्रीम कोर्ट में अपील करना।दूसरा, फैसला आने तक किसी वरिष्ठ कांग्रेस नेता को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाना।
लोकतांत्रिक परंपराओं में यही अपेक्षा की जा रही थी कि जब तक कानूनी स्थिति स्पष्ट न हो जाए, तब तक कोई दूसरा नेता सरकार चलाए और बाद में यदि राहत मिल जाए तो इंदिरा गांधी फिर पद संभाल लें। लेकिन राजनीति केवल संवैधानिक विकल्पों से नहीं चलती, सत्ता के समीकरण भी उसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं।

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कांग्रेस में क्यों शुरू हुई अंतरिम प्रधानमंत्री की चर्चा?
51 Years of Emergency समय कांग्रेस में कई ऐसे दिग्गज नेता थे जिनका अपना जनाधार और संगठन पर प्रभाव था।
जगजीवन राम, यशवंतराव चव्हाण, स्वर्ण सिंह, उमाशंकर दीक्षित और सिद्धार्थ शंकर रे जैसे नेताओं के नाम चर्चा में आने लगे।
कांग्रेस के भीतर यह आकलन होने लगा कि यदि इंदिरा गांधी को कुछ समय के लिए पद छोड़ना पड़ा तो अगला प्रधानमंत्री कौन होगा।यही वह स्थिति थी जिससे इंदिरा गांधी सबसे अधिक चिंतित थीं। क्योंकि इतिहास गवाह था कि भारतीय राजनीति में “अंतरिम” नेतृत्व कई बार स्थायी नेतृत्व बन जाता है।
51 Years of Emergency: इंदिरा गांधी को किस बात का डर था?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सबसे बड़ा डर विपक्ष नहीं बल्कि अपनी ही पार्टी थी। यदि किसी वरिष्ठ नेता को प्रधानमंत्री बना दिया जाता, तो संभव था कि वह संगठन और सरकार दोनों पर अपनी पकड़ मजबूत कर ले। कांग्रेस के भीतर पहले से मौजूद विभिन्न शक्ति केंद्र सक्रिय हो जाते।
ऐसी स्थिति में इंदिरा गांधी के लिए दोबारा उसी ताकत के साथ प्रधानमंत्री पद पर लौटना आसान नहीं होता। यानी संकट केवल अदालत का नहीं था, बल्कि कांग्रेस के अंदर नेतृत्व बदलने की संभावना भी थी।
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सुप्रीम कोर्ट से मिली आधी राहत
24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट के अवकाशकालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर ने अंतरिम राहत दी। उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर पूर्ण रोक नहीं लगाई। इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति मिली, लेकिन उनकी संसदीय शक्तियों पर कुछ सीमाएं लगा दी गईं। वे संसद में मतदान नहीं कर सकती थीं जब तक अंतिम फैसला न आ जाए। यह राहत राजनीतिक संकट को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकी।
51 Years of Emergency: इसके बाद आया सबसे बड़ा फैसला
25 जून 1975 की रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आंतरिक अशांति (Internal Disturbance) के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके साथ ही देश में इमरजेंसी लागू हो गई। रातों-रात विपक्ष के बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई। नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए। यहीं से भारतीय लोकतंत्र का वह अध्याय शुरू हुआ, जिसे आज भी सबसे विवादास्पद दौर माना जाता है।

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51 Years of Emergency से रुक गई अंतरिम PM की चर्चा?
व्यावहारिक रूप से हां। इमरजेंसी लागू होने के बाद कांग्रेस के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की सारी चर्चाएं समाप्त हो गईं। सरकार, संगठन और प्रशासन पूरी तरह प्रधानमंत्री कार्यालय के नियंत्रण में आ गया। विपक्ष जेल में था। मीडिया पर नियंत्रण था। असहमति की आवाजें दबा दी गईं। यानी जिस राजनीतिक अस्थिरता की आशंका थी, वह सत्ता के केंद्रीकरण के जरिए समाप्त कर दी गई।
51 Years of Emergency: कांग्रेस पर उठते रहे सवाल
इमरजेंसी के बाद से विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की बजाय सत्ता को प्राथमिकता दी गई।
आलोचकों का तर्क रहा कि यदि अदालत का फैसला स्वीकार कर अस्थायी नेतृत्व चुना जाता, तो लोकतांत्रिक परंपराएं और मजबूत होतीं।
दूसरी ओर कांग्रेस का पक्ष यह रहा कि उस समय देश गंभीर राजनीतिक अस्थिरता, आंदोलनों और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना कर रहा था तथा आपातकाल संविधान के प्रावधानों के तहत लगाया गया। इन दोनों दृष्टिकोणों पर इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच आज भी बहस जारी है।
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51 Years of Emergency: 21 महीने जिसने बदल दिया भारतीय लोकतंत्र
इमरजेंसी लगभग 21 महीने तक चली। इस दौरान हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं को जेल भेजा गया। प्रेस सेंसरशिप लागू रही। संविधान में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए।
सरकार के आलोचकों का कहना है कि इस अवधि में कार्यपालिका के हाथों में अत्यधिक शक्ति केंद्रित हो गई, जबकि समर्थकों ने इसे उस समय की परिस्थितियों में आवश्यक कदम बताया।
मार्च 1977 में चुनाव हुए। जनता पार्टी ने कांग्रेस को ऐतिहासिक हार दी। स्वयं इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हार गईं। यही चुनाव भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा भी माना जाता है, क्योंकि सत्ता अंततः जनता के वोट से बदली।
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51 Years of Emergency: यह भारतीय लोकतंत्र, न्यायपालिका, कार्यपालिका
1975 का संकट केवल एक चुनाव याचिका का मामला नहीं था। यह भारतीय लोकतंत्र, न्यायपालिका, कार्यपालिका और राजनीतिक दलों की आंतरिक संस्कृति की भी परीक्षा थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद अंतरिम प्रधानमंत्री का विकल्प मौजूद था, लेकिन तत्कालीन नेतृत्व ने दूसरा रास्ता चुना। उसके बाद लागू हुई इमरजेंसी आज भी भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित और विवादित अध्यायों में गिनी जाती है।
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राजनीतिक आलोचकों का मत है कि यदि कांग्रेस नेतृत्व उस समय सत्ता से अधिक लोकतांत्रिक परंपराओं को प्राथमिकता देता और अंतरिम नेतृत्व की संवैधानिक व्यवस्था अपनाता, तो भारतीय लोकतंत्र का इतिहास अलग हो सकता था। वहीं कांग्रेस का कहना रहा है कि उस दौर के निर्णय तत्कालीन राष्ट्रीय परिस्थितियों और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप थे।
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