BRICS Summit 2026: दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन में भारत की भूमिका की तारीफ करते पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा । PHOTO: PIB
BRICS Summit 2026 : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार और उसकी कई नीतियों के लंबे समय से आलोचक रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा के ताजा बयान ने राजनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है। BRICS Summit 2026 के बाद उन्होंने भारत की अध्यक्षता और कूटनीतिक भूमिका की तारीफ करते हुए तीन बड़ी सफलताएं गिनाईं। Yashwant Sinha का यह आकलन इसलिए खास है क्योंकि वह पिछले कई वर्षों में मोदी सरकार की आर्थिक और विदेश नीति पर कई बार तीखे सवाल उठा चुके हैं।
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Highlights
- यशवंत सिन्हा ने ब्रिक्स सम्मेलन में भारत की भूमिका को सफल बताया।
- प्रमुख वैश्विक नेताओं की मौजूदगी को पहली बड़ी उपलब्धि माना।
- मई की असहमति के बाद साझा घोषणापत्र बनना दूसरी बड़ी सफलता बताया।
- चीन के साथ सीधी और मजबूत बातचीत को महत्वपूर्ण माना।
- ईरान, गाजा और फिलिस्तीन पर सम्मेलन की भाषा से संतोष जताया।
तारीफ का असली कारण क्या है?
इस बयान का सबसे दिलचस्प पहलू केवल मोदी सरकार की तारीफ नहीं, बल्कि उसके पीछे दिया गया कूटनीतिक तर्क है। BRICS Summit 2026 को लेकर सिन्हा ने किसी एक घोषणा या फोटो अवसर को सफलता नहीं बताया, बल्कि नेताओं की भागीदारी, सदस्य देशों के बीच सहमति और द्विपक्षीय बातचीत को एक साथ देखा। Yashwant Sinha के मुताबिक किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की सफलता इसी बात से तय होती है कि मतभेद रखने वाले देश भी आखिरकार एक साझा रास्ता निकाल पाते हैं।
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पहली सफलता: बड़े नेताओं का दिल्ली आना
सिन्हा ने पहली सफलता के रूप में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग जैसे प्रमुख नेताओं की मौजूदगी का जिक्र किया। BRICS Summit 2026 में जिनपिंग की भारत यात्रा खास मानी गई, क्योंकि वह करीब सात साल बाद दिल्ली पहुंचे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अलग से बातचीत भी की। Yashwant Sinha का मानना है कि इतने संवेदनशील वैश्विक माहौल में ऐसे नेताओं की मौजूदगी सम्मेलन के राजनीतिक महत्व को बढ़ाती है।
‘सभी नेता आए’ वाले बयान पर जरूरी तथ्य
हालांकि सिन्हा की टिप्पणी को शाब्दिक तथ्य मानने से पहले एक बात साफ करना जरूरी है। BRICS Summit 2026 में लगभग सभी प्रमुख नेता मौजूद रहे, लेकिन ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा स्वयं दिल्ली नहीं आए और ब्राजील का प्रतिनिधित्व उसके विदेश मंत्री ने किया। इसलिए Yashwant Sinha की ‘सभी राष्ट्राध्यक्ष आए’ वाली टिप्पणी को उनकी व्यापक राजनीतिक व्याख्या के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि उपस्थित नेताओं की पूर्ण सूची के तथ्य के रूप में।
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दूसरी सफलता: जहां मई में सहमति नहीं बनी, वहां घोषणापत्र बना
सिन्हा ने साझा घोषणापत्र को सम्मेलन की दूसरी बड़ी उपलब्धि बताया। मई 2026 में दिल्ली में हुई विदेश मंत्रियों की बैठक में पश्चिम एशिया और ईरान से जुड़े मतभेदों के कारण संयुक्त बयान पर सहमति नहीं बन सकी थी। BRICS Summit 2026 तक भारत की अध्यक्षता में उन्हीं मतभेदों के बीच नई दिल्ली घोषणापत्र पर सहमति बन गई। Yashwant Sinha के मुताबिक इतने अलग-अलग राजनीतिक हितों वाले देशों को एक दस्तावेज पर राजी करना अपने आप में बड़ी कूटनीतिक सफलता है।
ईरान और यूएई के मतभेद भी थे बड़ी चुनौती
नई दिल्ली घोषणापत्र बनना आसान नहीं था, क्योंकि ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच पश्चिम एशिया की परिस्थितियों को लेकर गंभीर मतभेद मौजूद थे। BRICS Summit 2026 के दौरान दोनों पक्षों ने संयम और तनाव कम करने वाली साझा भाषा को स्वीकार किया। Yashwant Sinha की तारीफ को इसी संदर्भ में समझा जा सकता है कि भारत ने अध्यक्ष के रूप में ऐसे देशों के बीच सहमति बनाने में भूमिका निभाई जिनकी सुरक्षा और क्षेत्रीय प्राथमिकताएं कई मामलों में अलग हैं।
तीसरी सफलता: चीन के साथ सीधी बातचीत
सिन्हा ने तीसरी बड़ी उपलब्धि द्विपक्षीय बैठकों को बताया और इनमें चीन के साथ बैठक को सबसे महत्वपूर्ण माना। BRICS Summit 2026 के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग ने सीमा, व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला और बाजार तक पहुंच जैसे मुद्दों पर चर्चा की। Yashwant Sinha का कहना है कि चीन के साथ बातचीत जरूरी है, लेकिन भारत को अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा से जुड़े सवाल मजबूती के साथ सामने रखने चाहिए।
चीन के सामने क्या उठाया भारत ने?
भारत की ओर से सीमा क्षेत्रों में शांति को द्विपक्षीय संबंधों के आगे बढ़ने का जरूरी आधार बताया गया। BRICS Summit 2026 के दौरान दोनों नेताओं ने मौजूदा समझौतों का पालन करने और सीमा विवाद का स्वीकार्य समाधान खोजने पर बात की। Yashwant Sinha ने भारत की इस मजबूती को सकारात्मक माना और कहा कि बातचीत होनी चाहिए, लेकिन चीन के साथ पिछले अनुभवों को देखते हुए नई दिल्ली को लगातार सतर्क भी रहना चाहिए।
क्या सच में जिनपिंग नाराज हो गए थे?
यहीं इस खबर का सबसे संवेदनशील हिस्सा आता है। BRICS Summit 2026 के दौरान शी जिनपिंग प्रधानमंत्री मोदी की ओर से आयोजित रात्रिभोज में शामिल नहीं हुए। Yashwant Sinha ने संभावना जताई कि द्विपक्षीय बातचीत में भारत द्वारा मुद्दे मजबूती से उठाए जाने के कारण तल्खी पैदा हुई होगी और जिनपिंग खुश नहीं रहे होंगे। लेकिन इसे आधिकारिक तथ्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि उनकी अनुपस्थिति की कोई ऐसी आधिकारिक वजह नहीं बताई गई।
डिनर छोड़ने की दूसरी वजह भी सामने आई
कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि चीनी राष्ट्रपति लंबे कार्यक्रम के बाद अपने होटल लौट गए थे और आराम करना चाहते थे। इसलिए BRICS Summit 2026 के रात्रिभोज से उनकी अनुपस्थिति को भारत-चीन तनाव का निश्चित प्रमाण बताना सही नहीं होगा। Yashwant Sinha की टिप्पणी एक राजनीतिक और कूटनीतिक आकलन है, जबकि उपलब्ध आधिकारिक जानकारी केवल इतना पुष्ट करती है कि जिनपिंग डिनर में मौजूद नहीं थे।
ईरान पर बदला हुआ रुख क्यों पसंद आया?
पूर्व विदेश मंत्री ने सम्मेलन में ईरान की भूमिका और पश्चिम एशिया पर बनी सहमति को भी सकारात्मक माना। BRICS Summit 2026 के घोषणापत्र में ईरान के साथ-साथ व्यापक क्षेत्रीय तनाव, एकतरफा प्रतिबंधों और कूटनीतिक समाधान की जरूरत पर महत्वपूर्ण बातें दर्ज की गईं। Yashwant Sinha के मुताबिक भारत की परंपरागत विदेश नीति पश्चिम एशिया में संतुलन बनाने और सभी प्रमुख पक्षों से संवाद बनाए रखने पर आधारित रही है।
गाजा और फिलिस्तीन पर भी साफ भाषा
नई दिल्ली घोषणापत्र में गाजा में हिंसा, मानवीय सहायता और फिलिस्तीन के अधिकारों को लेकर विस्तृत भाषा शामिल की गई। BRICS Summit 2026 के दस्तावेज ने फिलिस्तीन की संयुक्त राष्ट्र में पूर्ण सदस्यता और दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन को दोहराया। Yashwant Sinha ने इसी वजह से सम्मेलन को भारत की परंपरागत फिलिस्तीन नीति के करीब जाने वाला घटनाक्रम माना और इस हिस्से पर संतोष जताया।
लेबनान को लेकर भी आया स्पष्ट संदेश
घोषणापत्र में लेबनान में संघर्षविराम का सम्मान करने और उसकी संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता बनाए रखने की बात भी कही गई। BRICS Summit 2026 में इस तरह पश्चिम एशिया के कई जटिल मुद्दों पर साझा भाषा बनना अपने आप में महत्वपूर्ण रहा। Yashwant Sinha ने भारत की भूमिका की तारीफ करते हुए इसी क्षमता को प्रमुखता दी कि अलग-अलग विचार वाले देशों को ऐसी भाषा पर सहमत कराया गया जिसे सभी स्वीकार कर सकें।
क्यों चौंकाने वाली है सिन्हा की तारीफ?
सिन्हा का राजनीतिक इतिहास इस बयान को और दिलचस्प बनाता है। BRICS Summit 2026 पर सकारात्मक टिप्पणी करने वाले पूर्व मंत्री ने अप्रैल 2018 में भाजपा छोड़ दी थी और इसके बाद मोदी सरकार के प्रमुख आलोचकों में शामिल रहे। Yashwant Sinha मार्च 2021 में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए और जून 2022 में विपक्षी दलों की ओर से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने से पहले पार्टी छोड़ दी।
वित्त और विदेश मंत्रालय संभाल चुके हैं सिन्हा
सिन्हा भारतीय प्रशासनिक सेवा छोड़कर राजनीति में आए और बाद में केंद्र सरकार में बड़े पदों तक पहुंचे। BRICS Summit 2026 पर उनका आकलन इसलिए भी महत्व रखता है क्योंकि वह स्वयं वित्त मंत्री और विदेश मंत्री जैसे अहम मंत्रालय संभाल चुके हैं। Yashwant Sinha अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में 2002 से 2004 तक विदेश मंत्री रहे, जबकि इससे पहले उन्होंने वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी भी संभाली थी।
तारीफ मोदी की या भारतीय कूटनीति की?
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इसे मोदी सरकार के प्रति सिन्हा के राजनीतिक रुख में बदलाव माना जाए? BRICS Summit 2026 पर उनके पूरे बयान को देखें तो जोर किसी राजनीतिक समर्थन से अधिक भारत की कूटनीतिक उपलब्धियों पर दिखाई देता है। Yashwant Sinha ने नेताओं की मौजूदगी, साझा घोषणापत्र और चीन से बातचीत को सफलता के मानक के रूप में रखा है, इसलिए इस बयान को तत्काल राजनीतिक यू-टर्न कहना जल्दबाजी होगी।
‘गिलास आधा भरा और आधा खाली’
सिन्हा ने सम्मेलन को समझाने के लिए गिलास का उदाहरण देते हुए कहा कि तस्वीर को केवल एक तरफ से नहीं देखना चाहिए। BRICS Summit 2026 में कई चुनौतियां और मतभेद बने रहे, लेकिन भारत ने अध्यक्ष के रूप में उन मुद्दों को ऐसी भाषा में लाने की कोशिश की जिसे अलग-अलग देश स्वीकार कर सकें। Yashwant Sinha का निष्कर्ष यही रहा कि कमियों के बावजूद भारत ने अपनी अध्यक्षता और भूमिका को सफल तरीके से निभाया।
भारत की कूटनीति की असली परीक्षा
सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही रही कि मई में जहां विदेश मंत्रियों के स्तर पर संयुक्त बयान तक नहीं बन पाया था, वहीं सितंबर में सदस्य देश एक विस्तृत घोषणापत्र पर सहमत हो गए। BRICS Summit 2026 इसलिए केवल नेताओं की मौजूदगी का मंच नहीं रहा, बल्कि कठिन वैश्विक मतभेदों के बीच सहमति बनाने की परीक्षा भी बना। Yashwant Sinha की तारीफ का नया और अहम एंगल इसी में छिपा है एक पुराने आलोचक ने सरकार की राजनीति नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक क्षमता को इस बार अच्छे अंक दिए हैं।
