विजय दिवस पर देहरादून में आयोजित समारोह में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी 1971 युद्ध के वीर सैनिकों और शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए
Vijay Diwas Dehradun Tribute: देहरादून की ठंडी हवा में आज इतिहास की गर्माहट थी। विजय दिवस का अवसर था और मंच पर खड़ा उत्तराखंड, अपने अतीत को याद कर रहा था वो अतीत, जिसने 1971 में भारत को न सिर्फ़ एक सैन्य जीत दी थी, बल्कि आत्मविश्वास, स्वाभिमान और राष्ट्रीय चेतना का नया अध्याय भी लिखा था। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जब श्रद्धांजलि एवं सम्मान समारोह में पहुंचे, तो यह केवल एक औपचारिक उपस्थिति नहीं थी, बल्कि एक पीढ़ी की ओर से दूसरी पीढ़ी को किया गया नमन था।
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1971 का युद्ध सिर्फ़ भारत-पाकिस्तान के बीच एक सैन्य संघर्ष नहीं था। यह युद्ध उन मूल्यों की परीक्षा थी, जिन पर भारतीय लोकतंत्र और भारतीय सेना खड़ी है। नौ महीने की गर्भावस्था के बाद जन्मा बांग्लादेश, दरअसल उन लाखों बलिदानों का परिणाम था, जिनमें भारतीय सैनिकों ने अपना आज कुर्बान कर देश का कल सुरक्षित किया। मुख्यमंत्री धामी ने जैसे ही शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की, वहां मौजूद हर व्यक्ति को यह एहसास हुआ कि विजय दिवस का अर्थ केवल जीत का जश्न नहीं, बल्कि उस कीमत को याद करना है, जो इस जीत के लिए चुकाई गई।
समारोह में जब 1971 के युद्ध में भाग लेने वाले वीर सैनिकों और शहीदों के परिजनों को सम्मानित किया गया, तो मंच पर इतिहास सजीव हो उठा। सफ़ेद बाल, कांपते हाथ, लेकिन आंखों में अब भी वही दृढ़ता-जो कभी सीमा पर खड़े होकर दुश्मन को चुनौती देती थी। मुख्यमंत्री ने न सिर्फ़ उनके योगदान को नमन किया, बल्कि यह भी स्वीकार किया कि आज का शांत भारत, उन्हीं की वजह से संभव हो पाया है। यह स्वीकारोक्ति केवल शब्दों में नहीं थी, बल्कि भाव में थी-उस भाव में, जो सत्ता और समाज के बीच की दूरी को पाटता है।
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सवाल यह नहीं है कि हमने विजय दिवस क्यों मनाया, सवाल यह है कि हम उसे कितना समझ पाए। मुख्यमंत्री धामी के वक्तव्य में यही सवाल गूंजता दिखा। उन्होंने कहा कि सैनिकों का सम्मान केवल एक दिन की रस्म नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह नीति और नीयत—दोनों का हिस्सा बनना चाहिए। इसी सोच के तहत उन्होंने सैनिक कल्याण से जुड़ी कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। ये घोषणाएं महज़ योजनाएं नहीं थीं, बल्कि एक संदेश थीं-कि सीमा पर तैनात सैनिक और उनके परिवार राज्य की प्राथमिकता हैं, मजबूरी नहीं।
उत्तराखंड, जिसे देवभूमि कहा जाता है, वह वीरभूमि भी है। शायद ही कोई गांव हो, जहां से किसी ने सेना की वर्दी न पहनी हो। मुख्यमंत्री ने इस तथ्य को रेखांकित करते हुए कहा कि सैनिकों का योगदान केवल युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि आपदा, शांति और राष्ट्रनिर्माण हर मोर्चे पर उनका योगदान अतुलनीय है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार सैनिकों के पुनर्वास, उनके बच्चों की शिक्षा और शहीद परिवारों की सामाजिक सुरक्षा को लेकर गंभीर है।
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समारोह के दौरान शहीदों के परिजनों की आंखों में जो नमी थी, वह दुख की नहीं, गर्व की थी। वह गर्व, जो तब होता है जब राष्ट्र यह स्वीकार करता है कि उसकी नींव किसी फाइल या भाषण से नहीं, बल्कि खून और बलिदान से बनी है। मुख्यमंत्री धामी ने जब कहा कि “राष्ट्र की सुरक्षा करने वाले हाथ कभी अकेले नहीं छोड़े जाएंगे,” तो यह सिर्फ़ एक वाक्य नहीं था, बल्कि राज्य की नैतिक प्रतिबद्धता का ऐलान था।
1971 की विजय ने भारत को यह सिखाया कि निर्णायक नेतृत्व, मजबूत सेना और नैतिक स्पष्टता मिलकर इतिहास की दिशा बदल सकते हैं। आज, जब देश अलग-अलग चुनौतियों से जूझ रहा है सीमा पर तनाव हो या भीतर सामाजिक असमंजस विजय दिवस हमें याद दिलाता है कि एकजुटता ही सबसे बड़ा हथियार है। देहरादून का यह समारोह, उसी एकजुटता का प्रतीक बनकर उभरा।
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अंतत यह कहना गलत नहीं होगा कि विजय दिवस के इस आयोजन ने केवल अतीत को नहीं याद किया, बल्कि भविष्य की दिशा भी तय की। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की मौजूदगी और घोषणाओं ने यह स्पष्ट किया कि उत्तराखंड सरकार सैनिकों को सम्मान की वस्तु नहीं, बल्कि नीति का केंद्र मानती है। और शायद यही विजय दिवस का असली अर्थ है याद रखना, समझना और उस याद को जिम्मेदारी में बदल देना।
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