Modi Putin Xi Jinping together at BRICS Summit 2026 in New Delhi.(PC- Deccan Herald)
BRICS: नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक साथ मौजूदगी ने वैश्विक राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान तीनों नेताओं की मुलाकात को सिर्फ एक औपचारिक कूटनीतिक तस्वीर के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। इसके पीछे बदलती वैश्विक राजनीति, अमेरिका का बढ़ता दबाव और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की कोशिश जैसे कई बड़े मुद्दे जुड़े हैं।
हालांकि, सवाल यह है कि मोदी-पुतिन-शी की यह नजदीकी वास्तव में वैश्विक व्यवस्था को बदल सकती है या फिर यह केवल एक प्रतीकात्मक संदेश तक सीमित रहेगी। इसका जवाब BRICS सम्मेलन से निकलने वाले ठोस फैसलों में छिपा है।
BRICS का बढ़ता दायरा और बढ़ती चुनौतियां
BRICS की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन से हुई थी और बाद में दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल हुआ। इसके बाद मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE और इंडोनेशिया जैसे देश भी समूह का हिस्सा बने। सऊदी अरब की स्थिति हालांकि अलग है और उसकी औपचारिक सदस्यता को लेकर अलग-अलग स्तर पर स्थिति स्पष्ट होती रही है।
BRICS के विस्तार ने इसे दुनिया के बड़े आर्थिक और राजनीतिक मंचों में शामिल कर दिया है। समूह में एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से लेकर खाड़ी के ऊर्जा उत्पादक देशों और अफ्रीकी देशों तक की मौजूदगी है। लेकिन यही विविधता BRICS के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी है।
BRICS में कोई स्थायी सचिवालय या साझा बजट नहीं है और बड़े फैसले आम सहमति से लिए जाते हैं। ऐसे में अलग-अलग देशों के हितों को एक मंच पर लाना आसान नहीं है। सदस्य देशों के बीच क्षेत्रीय विवाद और विदेश नीति को लेकर मतभेद कई बार समूह की एकजुटता पर सवाल खड़े करते हैं।
मोदी, पुतिन और शी के लिए BRICS क्यों अहम?
रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद मॉस्को ने एशिया और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ अपने आर्थिक संबंध बढ़ाए हैं। भारत रूस से ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में लंबे समय से सहयोग करता रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापार को आने वाले वर्षों में बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है।
चीन के लिए BRICS का महत्व इससे भी व्यापक है। बीजिंग वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने और पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती देने वाली बहुध्रुवीय व्यवस्था की वकालत करता रहा है। चीन के लिए BRICS ऐसा मंच है जहां वह अपनी आर्थिक और कूटनीतिक पहुंच को मजबूत कर सकता है।
भारत का रुख हालांकि अलग है। नई दिल्ली BRICS को किसी अमेरिका-विरोधी गठबंधन में बदलने के पक्ष में नहीं है। भारत एक साथ अमेरिका, यूरोप, क्वाड, G20 और रूस-चीन के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने की कोशिश करता है। यही भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का प्रमुख हिस्सा है।
भारत-चीन रिश्ते होंगे असली परीक्षा
मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात BRICS के लिए खास महत्व रखती है, क्योंकि भारत और चीन के रिश्तों में पिछले कुछ वर्षों में तनाव रहा है। सीमा विवाद के कारण दोनों देशों के राजनीतिक और आर्थिक संबंध प्रभावित हुए थे।

हाल के समय में दोनों पक्षों ने तनाव कम करने और संवाद बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। सीधी उड़ानों, वीजा और व्यापारिक संपर्कों में सुधार की कोशिशें इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं। लेकिन सीमा पर भरोसा पूरी तरह बहाल होना अभी बाकी है।
भारत के लिए चीन के साथ आर्थिक संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, सोलर उपकरण और कई औद्योगिक क्षेत्रों में भारतीय बाजार चीनी सप्लाई चेन पर निर्भर है। दूसरी तरफ, भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा लगातार चिंता का विषय रहा है। इसलिए दोनों देशों के रिश्तों में स्थिरता BRICS की कार्यक्षमता को भी प्रभावित कर सकती है।
डॉलर के विकल्प पर BRICS की रणनीति
BRICS को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा डॉलर के विकल्प की होती है। हालांकि, निकट भविष्य में कोई साझा BRICS करेंसी डॉलर की जगह लेगी, ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। इसके बजाय समूह स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान व्यवस्था और डिजिटल पेमेंट सिस्टम को मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है।
भारत भी तेज, सस्ते और सुरक्षित अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए अलग-अलग देशों की डिजिटल और भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल का समर्थन करता है। इसका मकसद डॉलर को तुरंत हटाना नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में विकल्प बढ़ाना है।
BRICS का न्यू डेवलपमेंट बैंक भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। बैंक इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लीन एनर्जी, ट्रांसपोर्ट और विकास से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए वित्त उपलब्ध कराता है। आने वाले समय में स्थानीय मुद्रा में कर्ज और निजी निवेश बढ़ाना इसकी भूमिका को और मजबूत कर सकता है।
अमेरिका का दबाव कितना बदल रहा समीकरण?
अमेरिका के साथ तनाव ने रूस और चीन को कई मुद्दों पर करीब लाया है। भारत पर भी रूसी तेल खरीद को लेकर पश्चिमी दबाव रहा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी BRICS देश अमेरिका के खिलाफ एक साझा मोर्चा बनाना चाहते हैं।
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खाड़ी देशों के अमेरिका और चीन दोनों के साथ मजबूत रिश्ते हैं। ब्राजील भी BRICS को सीधे पश्चिम-विरोधी संगठन बनाने से बचता रहा है। भारत की नीति भी साफ है कि वह किसी एक शक्ति खेमे का हिस्सा बनने के बजाय अपने रणनीतिक विकल्प खुले रखना चाहता है।
क्या मोदी-पुतिन-शी की तस्वीर बदलेगी दुनिया?
मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग की एक साथ तस्वीर निश्चित रूप से शक्तिशाली राजनीतिक संदेश देती है। लेकिन BRICS की असली सफलता तस्वीरों और घोषणाओं से नहीं, बल्कि ठोस फैसलों से तय होगी।
अगर भारत और चीन सीमा पर स्थिरता बनाए रखते हैं, BRICS अपने भुगतान तंत्र को आगे बढ़ाता है, न्यू डेवलपमेंट बैंक का विस्तार होता है और सदस्य देश साझा आर्थिक परियोजनाओं पर सहमति बना पाते हैं, तो BRICS वैश्विक व्यवस्था में अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है।
दुनिया फिलहाल एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रही है जहां अमेरिका और पश्चिमी देशों का प्रभाव बना हुआ है, लेकिन भारत, चीन, रूस और ग्लोबल साउथ के दूसरे देश भी अपनी भूमिका बढ़ाना चाहते हैं। ऐसे में मोदी-पुतिन-शी का ‘हैंडशेक’ इस बदलाव का प्रतीक जरूर है, लेकिन असली बदलाव तभी माना जाएगा जब BRICS प्रतीकात्मक मंच से आगे बढ़कर प्रभावी संस्थागत शक्ति बन सके।
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