Avimukteshwaranand Case: Swami Avimukteshwaranand Saraswati in a file photograph accompanying the case update । IMAGE NDTV
Avimukteshwaranand Case: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े कथित यौन शोषण मामले में घटनाक्रम केवल एफआईआर के आदेश तक सीमित नहीं है। फरवरी 2026 में प्रयागराज के झूंसी थाने में मामला दर्ज होने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें और सहआरोपी मुकुंदानंद को अग्रिम जमानत दी। मई में सुप्रीम कोर्ट ने इस राहत में हस्तक्षेप करने से इनकार किया। इसके बाद जून में शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी ने अपने पहले आरोपों से अलग बयान देते हुए मुकदमा दबाव में दर्ज कराने का दावा किया। हालांकि, यह दावा अपने आप में मामले के झूठा होने का न्यायिक निष्कर्ष नहीं है।
पांच प्रमुख बातें
- फरवरी 2026 में झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज हुई।
- 25 मार्च को हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत मंजूर की।
- 29 मई को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत में हस्तक्षेप से इनकार किया।
- जून में शिकायतकर्ता ने दबाव में मुकदमा कराने का दावा किया।
- सितंबर में मुकुंदानंद की अलग एफआईआर की मांग खारिज हुई; साक्ष्य जांच अधिकारी को देने के निर्देश मिले।
फरवरी में दर्ज हो चुका है मुकदमा
Avimukteshwaranand Case आशुतोष ब्रह्मचारी की शिकायत से सामने आया था। उन्होंने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके सहयोगी पर कथित यौन शोषण के आरोप लगाते हुए अदालत से पुलिस जांच की मांग की थी। विशेष पॉक्सो अदालत के आदेश के बाद झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज हुई। इसलिए अब इसे ‘मुकदमा दर्ज किया जाएगा’ के रूप में प्रस्तुत करना घटनाक्रम की अधूरी तस्वीर होगी।
शुरुआती आरोपों में दो युवाओं से संबंधित कथित घटनाओं का उल्लेख था और मामला पॉक्सो अधिनियम के प्रावधानों के तहत भी दर्ज किया गया। हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोपों और अदालत में अपराध सिद्ध होने के बीच अंतर है। उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर किसी आरोपी को दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा।
हाईकोर्ट से मिली अग्रिम जमानत Avimukteshwaranand Sexual Abuse Case
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट 5 मार्च 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Avimukteshwaranand Case में उनके शिष्य स्वामी प्रत्यक्चैतन्य मुकुंदानंद गिरि की अग्रिम जमानत मंजूर की। न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की पीठ ने शिकायत दर्ज होने के घटनाक्रम, उपलब्ध सामग्री और बयानों से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार किया था।
खास बात यह है कि अदालत ने स्पष्ट किया था कि उसकी टिप्पणियां अग्रिम जमानत की अर्जी तय करने तक सीमित हैं और जांच या मुकदमे को प्रभावित नहीं करेंगी। इसके साथ ही संबंधित पक्षों को जांच और सुनवाई के दौरान इस मामले पर मीडिया इंटरव्यू नहीं देने के निर्देश भी दिए गए थे। इसलिए जमानत को आरोपों से अंतिम मुक्ति या दोषमुक्ति बताना सही नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने राहत में हस्तक्षेप नहीं किया
Avimukteshwaranand Case के बाद शिकायतकर्ता ने हाईकोर्ट के अग्रिम जमानत आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 29 मई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, शीर्ष अदालत ने इस चुनौती को खारिज कर दिया और हाईकोर्ट से मिली राहत बरकरार रही। संबंधित रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया कि पुलिस जांच की प्रक्रिया आगे चल सकती है।
इस निर्णय का महत्व गिरफ्तारी से संबंधित कानूनी संरक्षण तक समझना चाहिए। इसे न तो आरोप सही साबित होने का फैसला कहा जा सकता है और न ही पूरे मुकदमे के समाप्त होने का आदेश। मामले की वास्तविक स्थिति समझने के लिए जमानत के आदेश और जांच के निष्कर्षों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

जून में शिकायतकर्ता का बदला बयान
Avimukteshwaranand Case में 10 जून 2026 को प्रकाशित रिपोर्टों में आशुतोष ब्रह्मचारी ने दावा किया कि उन्होंने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ मुकदमा दबाव में दर्ज कराया था। उन्होंने अपने पहले रुख से अलग बयान देते हुए मामला “फर्जी” होने की बात कही और इसके पीछे दूसरे लोगों के दबाव का आरोप लगाया।
हालांकि, शिकायतकर्ता का नया बयान भी जांच और सत्यापन का विषय है। उनके बयान बदलने भर से मूल आरोप स्वतः समाप्त नहीं होते। उसी तरह दबाव या साजिश संबंधी उनके नए आरोपों को भी बिना स्वतंत्र प्रमाण के स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता। इस घटनाक्रम को रिपोर्ट करते समय दोनों स्थितियों का उल्लेख आवश्यक है
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सितंबर में अलग अर्जी पर आदेश (Avimukteshwaranand Case)
8 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, प्रयागराज की विशेष पॉक्सो अदालत ने मुकुंदानंद की उस अर्जी को खारिज कर दिया, जिसमें आशुतोष ब्रह्मचारी समेत अन्य लोगों के खिलाफ नई एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई थी। अदालत ने उनके पास मौजूद दस्तावेजी, डिजिटल और अन्य संबंधित साक्ष्य जांच अधिकारी को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।
रिपोर्ट के मुताबिक, यह अर्जी आशुतोष से संबंधित पहले से दर्ज केस संख्या 58/2026 की जांच से जुड़ी थी। इसे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ मूल यौन शोषण मामले में दोषसिद्धि या दोषमुक्ति का आदेश नहीं समझना चाहिए। अदालत ने जांच अधिकारी को प्रासंगिक सामग्री की स्वतंत्र जांच करने और टिप्पणियों से प्रभावित नहीं होने को कहा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि स्पेशल पॉक्सो कोर्ट का यह आदेश प्रारंभिक स्तर पर जांच सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण कदम है। अब जांच एजेंसियों के सामने चुनौती होगी कि प्रस्तुत साक्ष्यों की सत्यता की जांच कर तथ्यों को सामने लाया जाए।
धार्मिक और सामाजिक हलकों में चर्चा
Avimukteshwaranand Case के बाद धार्मिक समुदायों में हलचल है। कुछ लोग इसे साजिश करार दे रहे हैं, तो कुछ इसे गंभीर आरोप मानते हुए निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से अभी तक औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
उधर, आशुतोष ब्रह्मचारी ने कहा है कि उन्हें न्याय की दिशा में पहला कदम मिला है और वे प्रयागराज से वाराणसी स्थित विद्या मठ तक पैदल यात्रा निकालेंगे। उनका कहना है कि यह यात्रा सनातन धर्म की मर्यादा और न्याय की मांग के समर्थन में होगी।
अभी क्या स्पष्ट है?
Avimukteshwaranand Case 19 अक्टूबर 2026 तक इस सत्यापन में उपलब्ध रिपोर्टों से एफआईआर, अग्रिम जमानत, सुप्रीम कोर्ट में चुनौती खारिज होने और शिकायतकर्ता के बदले बयान की पुष्टि होती है। मूल यौन शोषण प्रकरण में किसी अंतिम दोषसिद्धि, बरी होने या मुकदमा समाप्त करने के नए आदेश की पुष्टि नहीं मिली है।
इसलिए खबर का केंद्र आरोपों को दोहराने के बजाय पूरा घटनाक्रम होना चाहिए। आगे की स्थिति पुलिस की प्रमाणित रिपोर्ट और संबंधित न्यायिक आदेश से स्पष्ट होगी। कथित पीड़ितों की पहचान उजागर करने वाली जानकारी तथा अपुष्ट डिजिटल सामग्री को सार्वजनिक किए बिना मामले की रिपोर्टिंग करना भी आवश्यक है।
–समाप्त
Avimukteshwaranand Case UPDATE
