Himachal Forest Economy and ₹22,600 crore forest wealth under 5-year ISB-BIPP MoU
Himachal Forest Economy: हिमाचल प्रदेश के जंगल अब सिर्फ पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता के लिए ही नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार के बड़े स्रोत के रूप में भी देखे जा रहे हैं। राज्य सरकार के वन विभाग और इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस के भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी (ISB-BIPP) के बीच पांच साल के लिए एक समझौता हुआ है। इस पहल का उद्देश्य आधुनिक तकनीक, डेटा, स्थानीय समुदायों और वैज्ञानिक प्रबंधन की मदद से राज्य की वन एवं चरागाह आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है।
5 साल के समझौते से बदलेगी वन अर्थव्यवस्था की तस्वीर
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू की मौजूदगी में वन विभाग और ISB-BIPP के बीच यह एमओयू किया गया। इसके तहत हिमाचल के वन संसाधनों की आर्थिक क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण पर भी ध्यान दिया जाएगा।
Himachal Forest Economy को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय लोगों को वन उपज के संग्रहण से लेकर उसके प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंचाने में अधिक भूमिका देने की योजना है। सरकार का मानना है कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
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गांव की महिलाएं और स्थानीय समुदाय बनेंगे अर्थव्यवस्था का हिस्सा
इस योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा स्थानीय ग्रामीणों और महिलाओं द्वारा संचालित उत्पादक कंपनियों को बढ़ावा देना है। इन कंपनियों के जरिए ग्रामीण वन उपज को सीधे बाजार तक पहुंचा सकेंगे।
इससे बिचौलियों पर निर्भरता कम करने और उत्पादों का बेहतर मूल्य प्राप्त करने में मदद मिल सकती है। पांगी की पीर पंजाल जंगल प्रोड्यूसर कंपनी इसका एक उदाहरण है, जो थंगी यानी हेजलनट के कारोबार से जुड़ी है।
सरकार और संस्थान का लक्ष्य ऐसे स्थानीय उद्यमों को आगे बढ़ाना है, ताकि जंगलों से मिलने वाले संसाधनों का लाभ सीधे उन समुदायों तक पहुंच सके, जिनकी आजीविका लंबे समय से इन संसाधनों पर निर्भर रही है।
AI और सैटेलाइट से होगी जंगलों की निगरानी
Himachal Forest Economy में तकनीक की भूमिका बढ़ाने के लिए फॉरेस्ट इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म विकसित किया जाएगा। इसमें सैटेलाइट इमेजरी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा।
इस डिजिटल प्लेटफॉर्म को फिलहाल पालमपुर वन मंडल में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू करने की योजना है। इसके जरिए वन क्षेत्रों की स्थिति, संसाधनों और संभावित बदलावों की निगरानी ज्यादा व्यवस्थित तरीके से की जा सकेगी। डेटा आधारित प्रबंधन से वन अधिकारियों को नीतियां बनाने और संसाधनों के इस्तेमाल से जुड़े फैसले लेने में भी मदद मिल सकती है।
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चरवाहों के लिए बनेगा खास Grazing Portal
समझौते के तहत हिमाचल प्रदेश की चरवाहा नीति 2026 को ध्यान में रखते हुए एक समर्पित Grazing Portal तैयार किया जाएगा। इसमें राज्य के चरवाहों से संबंधित जरूरी जानकारी को डिजिटल तरीके से व्यवस्थित करने की योजना है।
इस पोर्टल को आधार, हिम परिवार, भारत पशुधन और ‘पहल’ योजना से जोड़ने की बात कही गई है। इसका उद्देश्य चरवाहों का डेटाबेस तैयार करना और चराई से जुड़े मामलों को अधिक व्यवस्थित बनाना है।
इस व्यवस्था से सरकार को चरवाहों और उनके पशुधन से संबंधित जानकारी बेहतर तरीके से उपलब्ध हो सकेगी। साथ ही नीतियों और सरकारी योजनाओं को जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने में भी मदद मिल सकती है।
हिमाचल के जंगलों में 22,600 करोड़ रुपये की क्षमता
ISB-BIPP और वन विभाग की संयुक्त रिपोर्ट ‘Counting Green Wealth’ में हिमाचल के कुछ प्रमुख जैविक संसाधनों की आर्थिक क्षमता का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार आंवला, चीड़ की पत्तियां, जंगली आम, साल के बीज और बुरांश के फूल जैसे संसाधनों में बड़ी आर्थिक संभावनाएं मौजूद हैं।
इन संसाधनों का अनुमानित कुल मूल्य करीब 22,600 करोड़ रुपये बताया गया है। आंकड़ों के मुताबिक आंवला की संभावित आर्थिक क्षमता करीब 8,700 करोड़ रुपये, चीड़ की पत्तियों की 5,500 करोड़ रुपये, जंगली आम की 4,800 करोड़ रुपये, साल के बीज की 2,400 करोड़ रुपये और बुरांश के फूलों की करीब 1,200 करोड़ रुपये आंकी गई है।
चीड़ की पत्तियां बन सकती हैं आय का जरिया
हिमाचल के जंगलों में बड़ी मात्रा में मिलने वाली चीड़ की पत्तियां लंबे समय से जंगलों में आग फैलने के जोखिम से भी जुड़ी रही हैं। अब इनके व्यावसायिक उपयोग की संभावनाओं पर जोर दिया जा रहा है।
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चीड़ की पत्तियों का इस्तेमाल ऊर्जा, जैविक उत्पादों और हस्तशिल्प जैसी गतिविधियों में किया जा सकता है। यदि इनके संग्रहण और प्रसंस्करण की व्यवस्थित व्यवस्था विकसित होती है, तो इससे एक तरफ जंगलों में ज्वलनशील सामग्री कम करने में मदद मिल सकती है और दूसरी तरफ स्थानीय लोगों के लिए आय का नया स्रोत तैयार हो सकता है।
औषधीय और स्थानीय उत्पादों से बढ़ सकती है ग्रामीण आय
हिमाचल के जंगलों में पाए जाने वाले कई स्थानीय और औषधीय संसाधनों का भी आर्थिक महत्व है। हरड़, बेल और थंगी जैसे उत्पादों को बेहतर तरीके से बाजार से जोड़ने पर ग्रामीण परिवारों की आमदनी बढ़ सकती है।
Himachal Forest Economy का उद्देश्य केवल वन उत्पादों का व्यावसायीकरण करना नहीं है, बल्कि उन्हें टिकाऊ तरीके से इस्तेमाल करना भी है। यानी जंगलों से संसाधन लिए जाएं, लेकिन प्राकृतिक संतुलन और भविष्य की जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाए।
प्रशिक्षण पर भी रहेगा खास जोर
एमओयू के तहत वन विभाग के कर्मचारियों और स्थानीय हितधारकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। इनमें डेटा आधारित वन प्रबंधन, स्थानीय उद्यमों के संचालन और वन संसाधनों के टिकाऊ उपयोग से जुड़ी जानकारी दी जाएगी।
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प्रशिक्षण से स्थानीय समुदायों को केवल वन उपज एकत्र करने तक सीमित रखने के बजाय उन्हें प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ाया जा सकता है।
पर्यावरण और रोजगार के बीच संतुलन की कोशिश
हिमाचल सरकार की यह पहल वन संरक्षण और ग्रामीण विकास के बीच संतुलन बनाने की कोशिश के तौर पर देखी जा रही है। यदि वैज्ञानिक प्रबंधन, तकनीक और स्थानीय भागीदारी को प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है, तो जंगलों से जुड़े संसाधन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
Himachal Forest Economy की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि 22,600 करोड़ रुपये की अनुमानित क्षमता को जमीन पर किस तरह टिकाऊ व्यवसाय, रोजगार और स्थानीय आय में बदला जाता है। पांच साल का यह समझौता इसी दिशा में एक लंबी अवधि की पहल है, जिस पर आने वाले समय में नजर रहेगी।
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