Sugar price rise in India as retail sugar prices increase due to lower production, weather impact and global supply shortage
Sugar Price Rise: पिछले कुछ हफ्तों में देश में Sugar Price Rise ने आम उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। जुलाई के अंत तक करीब 48.50 रुपये प्रति किलोग्राम चल रही चीनी की कीमत 21 अगस्त तक बढ़कर 62.45 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई। यानी करीब एक महीने में कीमत में लगभग 14 रुपये प्रति किलो का इजाफा हुआ है। त्योहारों का सीजन शुरू होने से पहले चीनी की बढ़ती कीमतों ने सरकार और कारोबारियों दोनों की चिंता बढ़ा दी है।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर Sugar Price Rise की असली वजह क्या है? क्या इथेनॉल के लिए गन्ने और चीनी का इस्तेमाल इसकी बड़ी वजह है या फिर खराब मौसम, फसल में बीमारी और वैश्विक बाजार में कम उत्पादन ने कीमतों को ऊपर पहुंचाया है? उपलब्ध आंकड़ों और उद्योग से जुड़े लोगों की राय को देखें तो इसकी वजह सिर्फ एक नहीं, बल्कि कई कारकों का संयुक्त असर है।
एक महीने में लगातार बढ़ी चीनी की कीमत
चीनी के दाम में हुई तेजी को पिछले कुछ सप्ताह के आंकड़ों से आसानी से समझा जा सकता है। 24 जुलाई को कीमत करीब 48.50 रुपये प्रति किलो थी। 31 जुलाई को यह बढ़कर 51.99 रुपये हुई और 7 अगस्त को 55.48 रुपये तक पहुंच गई।
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इसके बाद 14 अगस्त को कीमत 58.97 रुपये और 21 अगस्त को 62.45 रुपये प्रति किलो दर्ज की गई। यानी हर सप्ताह कीमत में लगातार बढ़ोतरी हुई। यही वजह है कि Sugar Price Rise अब घरेलू बजट और त्योहारों की खरीदारी से जुड़ा अहम मुद्दा बन गया है।
उत्पादन अनुमान में बड़ी कटौती
चीनी की कीमत बढ़ने की सबसे अहम वजहों में घरेलू उत्पादन में कमी को माना जा रहा है। वर्ष 2025-26 के लिए पहले करीब 343 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया गया था। बाद में इसे घटाकर करीब 306 लाख टन कर दिया गया।
भारत में सालाना चीनी की खपत लगभग 2.6 करोड़ से 2.8 करोड़ टन के बीच रहती है। ऐसे में उत्पादन और खपत के बीच अंतर बहुत ज्यादा नहीं है। इसके बावजूद बाजार में कीमतों में तेजी दिखाई दे रही है। यही कारण है कि विशेषज्ञ केवल उत्पादन के आंकड़े के बजाय उपलब्ध स्टॉक, बाजार की धारणा और मांग को भी महत्वपूर्ण मान रहे हैं।
बारिश और बीमारी ने गन्ने की फसल को पहुंचाया नुकसान
Sugar Price Rise के पीछे मौसम भी एक महत्वपूर्ण कारण है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात में पिछले साल सितंबर-अक्टूबर के दौरान हुई भारी बारिश का असर गन्ने की फसल पर पड़ा। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में गन्ने की फसल में गेरुआ रोग की समस्या भी सामने आई, जिससे उत्पादन प्रभावित हुआ।
उद्योग से जुड़े शुरुआती अनुमानों के मुताबिक चीनी उत्पादन करीब 309 लाख टन रहा, जबकि इथेनॉल उत्पादन के लिए लगभग 30 लाख टन के बराबर चीनी डायवर्ट की गई। इससे प्रभावी चीनी उपलब्धता पर दबाव पड़ा।
क्या इथेनॉल बना चीनी महंगी होने की वजह?
चीनी की कीमत बढ़ने के साथ सबसे ज्यादा चर्चा इथेनॉल की हो रही है। हालांकि सरकार ने इस धारणा को खारिज किया है कि मौजूदा तेजी का मुख्य कारण इथेनॉल के लिए चीनी का इस्तेमाल है।
सरकार के अनुसार 2022-23 मार्केटिंग ईयर में करीब 43 लाख टन चीनी इथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट की गई थी। वहीं 2025-26 में यह मात्रा लगभग 28 लाख टन रही। यानी इथेनॉल के लिए डायवर्जन पहले की तुलना में कम हुआ है।
सरकार का यह भी कहना है कि अब इथेनॉल उत्पादन में चीनी के मुकाबले मक्के जैसे अनाज की भूमिका बढ़ी है। इसलिए केवल इथेनॉल नीति को मौजूदा Sugar Price Rise के लिए जिम्मेदार ठहराना सही तस्वीर नहीं देता।
इथेनॉल का दोहरा असर
हालांकि, इसका मतलब यह भी नहीं है कि इथेनॉल का चीनी बाजार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जब चीनी का कुछ हिस्सा इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होता है तो वह मात्रा घरेलू चीनी बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं रहती।
अगर किसी साल पहले से ही चीनी का उत्पादन कम हो, तो डायवर्जन उपलब्ध सप्लाई पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। दूसरी ओर, चीनी मिलों के लिए इथेनॉल एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक आय स्रोत बन गया है। इससे मिलों को केवल चीनी की कीमत पर निर्भर नहीं रहना पड़ता और अतिरिक्त गन्ने का बेहतर इस्तेमाल संभव होता है।
सरकार ने उठाए ये कदम
बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं। इनमें 10 लाख टन कच्ची चीनी को बिना ड्यूटी आयात करने की अनुमति देना प्रमुख है। सरकार का उद्देश्य घरेलू बाजार में पर्याप्त सप्लाई बनाए रखना और कीमतों में अनावश्यक तेजी को रोकना है।
इसके अलावा बड़े औद्योगिक खरीदारों, जैसे सॉफ्ट ड्रिंक और आइसक्रीम बनाने वाली कंपनियों के लिए स्टॉक से जुड़ी सीमा तय की गई है। उद्योग संगठनों का भी मानना है कि घबराहट में जरूरत से ज्यादा खरीदारी करने की आवश्यकता नहीं है।
देश में चीनी का पर्याप्त स्टॉक मौजूद
बाजार में तेजी के बावजूद देश में चीनी की तत्काल कमी की स्थिति नहीं बताई जा रही है। वर्ष 2024-25 के अंत में करीब 50 लाख टन का अतिरिक्त स्टॉक मौजूद था। सरकार और उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि नया पेराई सीजन शुरू होने तक घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध है।
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इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने भी कहा है कि नई फसल की चीनी बाजार में सामान्य समय से पहले पहुंच सकती है। इससे आने वाले महीनों में कीमतों पर दबाव कम होने की उम्मीद है।
दुनिया में भी बढ़ी चीनी की कीमत
भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जहां Sugar Price Rise देखने को मिल रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चीनी महंगी हुई है। 30 जून को अंतरराष्ट्रीय कीमत करीब 474 डॉलर प्रति टन थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर लगभग 552 डॉलर प्रति टन हो गई। यानी इस अवधि में करीब 16 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
ब्राजील और थाईलैंड जैसे बड़े उत्पादक देशों में उत्पादन घटने से वैश्विक सप्लाई पर असर पड़ा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक ब्राजील का उत्पादन करीब 26 प्रतिशत और थाईलैंड का उत्पादन 15 प्रतिशत से अधिक घटा। इससे वैश्विक बाजार में संभावित सरप्लस की स्थिति बदलकर कमी में पहुंच गई।
आगे क्या होगा?
Sugar Price Rise के पीछे घरेलू उत्पादन में कमी, मौसम का असर, फसल की बीमारी, त्योहारों से पहले बढ़ती मांग, वैश्विक सप्लाई में कमी और बाजार में सट्टेबाजी जैसे कई कारण जिम्मेदार नजर आते हैं। इथेनॉल नीति का कुछ असर सप्लाई पर जरूर पड़ सकता है, लेकिन मौजूदा तेजी को केवल इथेनॉल से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं होगी।
सरकार की ओर से आयात और स्टॉक से जुड़े कदमों के साथ नए पेराई सीजन के शुरू होने का इंतजार अब महत्वपूर्ण होगा। यदि नई चीनी समय पर बाजार में आती है और उत्पादन उम्मीद के मुताबिक रहता है, तो आने वाले महीनों में कीमतों में राहत मिल सकती है। फिलहाल त्योहारों के मौसम में उपभोक्ताओं के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि Sugar Price Rise कितनी देर तक जारी रहती है।
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