Environmental activists protesting against the felling of over 3,300 trees at Seven Bend after the government suspended the tree-cutting drive.
Tree Cutting: उत्तराखंड के देहरादून-ऋषिकेश सिक्स लेन परियोजना के तहत प्रस्तावित Tree Cutting पर फिलहाल रोक लगने के बाद सात मोड़ क्षेत्र में राहत का माहौल है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा लगभग 3,300 पेड़ों की कटाई की प्रक्रिया को फिलहाल स्थगित किए जाने की घोषणा के बाद पर्यावरण संरक्षण की मांग कर रहे लोगों ने इसे एक महत्वपूर्ण सफलता बताया है। हालांकि पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यह अंतिम जीत नहीं है, क्योंकि Tree Cutting को केवल रोका गया है, पूरी तरह रद्द नहीं किया गया है।
पिछले कई दिनों से सात मोड़ क्षेत्र में स्थानीय लोग, सामाजिक संगठन और पर्यावरण कार्यकर्ता लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। उनका कहना था कि सड़क चौड़ीकरण के नाम पर हजारों पेड़ों की कटाई से न केवल जंगलों का अस्तित्व प्रभावित होगा, बल्कि हाथियों सहित कई वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास भी खतरे में पड़ जाएगा। ऐसे में Tree Cutting पर लगी यह अस्थायी रोक उनके आंदोलन का पहला सकारात्मक परिणाम माना जा रहा है।
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नौ दिन के आंदोलन के बाद मिला सकारात्मक संकेत
सात मोड़ क्षेत्र में लगातार नौ दिनों तक चले शांतिपूर्ण आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधकर उन्हें बचाने का संदेश दिया। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि उनकी मांग विकास कार्यों को रोकना नहीं, बल्कि ऐसा विकल्प तलाशना है जिससे विकास और पर्यावरण दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सके।
आंदोलन में शामिल युवाओं का कहना है कि यदि सड़क परियोजना को एलिवेटेड रोड के रूप में विकसित किया जाए तो बड़ी संख्या में पेड़ों को बचाया जा सकता है। उनका मानना है कि आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों के जरिए Tree Cutting को न्यूनतम स्तर तक सीमित किया जा सकता है।
राहुल गांधी से मुलाकात के बाद तेज हुई चर्चा
आंदोलन में शामिल प्रदर्शनकारियों के अनुसार, हाल ही में जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इस क्षेत्र से गुजर रहे थे, तब उन्हें रोककर सात मोड़ में प्रस्तावित Tree Cutting का मुद्दा बताया गया। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि राहुल गांधी ने इस विषय को संसद में उठाने का आश्वासन दिया था। इसके अगले दिन मुख्यमंत्री द्वारा पेड़ों की कटाई स्थगित करने की घोषणा सामने आई, जिससे आंदोलनकारियों में उम्मीद की नई किरण जगी।
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हालांकि प्रदर्शनकारी यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि इस फैसले को किसी राजनीतिक जीत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनजागरण का परिणाम माना जाना चाहिए।
पर्यावरण प्रेमियों ने उठाए कई अहम सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि अब तक लगभग 700 से अधिक पेड़ों की कटाई हो चुकी है, जिसकी भरपाई केवल पौधारोपण से संभव नहीं होगी। उनका तर्क है कि एक परिपक्व पेड़ तैयार होने में कई दशक लगते हैं और इतने वर्षों में वह हजारों जीव-जंतुओं तथा पक्षियों का आश्रय बन जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि Tree Cutting केवल पेड़ों की संख्या कम नहीं करता, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है। इससे भूजल स्तर, जैव विविधता, वायु गुणवत्ता और स्थानीय जलवायु पर भी असर पड़ता है।
एलीफेंट कॉरिडोर पर भी मंडरा रहा खतरा
देहरादून-ऋषिकेश मार्ग का सात मोड़ क्षेत्र एलीफेंट कॉरिडोर के रूप में जाना जाता है। यहां हाथियों सहित कई जंगली जानवर नियमित रूप से आवाजाही करते हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि बड़े पैमाने पर Tree Cutting हुआ तो वन्यजीवों के प्राकृतिक मार्ग बाधित होंगे, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
बरसात का मौसम कई पक्षियों और वन्यजीवों के प्रजनन का समय भी होता है। ऐसे समय में पेड़ों की कटाई से उनके घोंसले और प्राकृतिक आवास नष्ट होने की आशंका बढ़ जाती है। इसी कारण पर्यावरण संगठनों ने इस समय Tree Cutting का विशेष विरोध किया।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की मांग
आंदोलनकारियों का कहना है कि वे सड़क निर्माण के विरोधी नहीं हैं। उनका उद्देश्य केवल इतना है कि परियोजना को इस प्रकार तैयार किया जाए जिससे पर्यावरण को न्यूनतम नुकसान पहुंचे। उनका सुझाव है कि एलिवेटेड रोड, वैकल्पिक डिजाइन और आधुनिक निर्माण तकनीकों के माध्यम से हजारों पेड़ों को बचाया जा सकता है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि आज दुनिया के कई देशों में हाईवे परियोजनाओं को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि जंगलों और वन्यजीवों पर उनका प्रभाव कम से कम पड़े। उत्तराखंड जैसे पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील राज्य में भी ऐसी योजनाओं पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
अभी खत्म नहीं हुई लड़ाई
पर्यावरण प्रेमियों ने स्पष्ट किया है कि Tree Cutting पर लगी रोक फिलहाल अस्थायी है। इसलिए वे आगे की रणनीति तैयार कर रहे हैं ताकि भविष्य में इस क्षेत्र के पेड़ों और वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। उनका कहना है कि विकास आवश्यक है, लेकिन यदि विकास की कीमत प्रकृति का विनाश होगी तो आने वाली पीढ़ियों को इसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ेगा।
सात मोड़ का यह आंदोलन अब केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन बनाने की बहस का प्रमुख विषय बन चुका है। आने वाले दिनों में सरकार, विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों के बीच संवाद से ही इस परियोजना का ऐसा समाधान निकल सकता है जो विकास के साथ-साथ प्रकृति की सुरक्षा भी सुनिश्चित करे।
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