Nanda Devi Raj Jat Yatra 2026 begins from Kurud as Maa Nanda palanquins leave for Kailash in Chamoli Uttarakhand.(pc- team)
Nanda Devi Raj Jat Yatra: उत्तराखंड की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक यात्राओं में शामिल मां नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा शनिवार, 5 सितंबर से शुरू हो गई। हिमालय महाकुंभ के रूप में पहचानी जाने वाली इस यात्रा में सिद्धपीठ कुरुड़ से मां नंदा राजराजेश्वरी की तीन डोलियां कैलाश के लिए रवाना हुईं। डोली के प्रस्थान के साथ ही पूरा क्षेत्र ‘जय मां नंदा’ के जयकारों और पारंपरिक ढोल-नगाड़ों से गूंज उठा। बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी मां की डोली के साथ यात्रा में शामिल हुए।
इस साल आयोजित हो रही Nanda Devi Raj Jat Yatra खास इसलिए भी है क्योंकि 12 वर्ष बाद बड़ी जात का आयोजन हो रहा है। हालांकि इस बार यात्रा को लेकर अलग-अलग समितियों के बीच मतभेद के कारण दो अलग आयोजनों की स्थिति बनी हुई है। कुरुड़ मंदिर समिति ने परंपरा के अनुसार इस वर्ष यात्रा निकालने का निर्णय लिया है, जबकि नौटी राजजात समिति और जिला प्रशासन ने व्यापक नंदा देवी राजजात यात्रा को वर्ष 2027 में आयोजित करने का फैसला किया है।
पांच दिन की पूजा-अर्चना के बाद कैलाश के लिए विदा हुई डोली
सिद्धपीठ कुरुड़ में पांच दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए। वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच मां नंदा की डोली को कैलाश के लिए विदा किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने मां के दर्शन किए और यात्रा की सफलता व सभी यात्रियों की मंगलकामना की।
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मां नंदा की डोली के प्रस्थान के समय कई श्रद्धालु भावुक भी नजर आए। उत्तराखंड की लोक परंपराओं में मां नंदा को बेटी के रूप में देखा जाता है और इस यात्रा को मायके से ससुराल कैलाश की ओर उनकी विदाई के रूप में भी माना जाता है। यही धार्मिक और सांस्कृतिक भावना Nanda Devi Raj Jat Yatra को उत्तराखंड की सबसे विशिष्ट यात्राओं में शामिल करती है।
करीब 280 किलोमीटर की लंबी हिमालयी पैदल यात्रा
मां नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा को विश्व की सबसे लंबी और कठिन धार्मिक पैदल यात्राओं में गिना जाता है। यात्रा का कुल मार्ग करीब 280 किलोमीटर का माना जाता है। सामान्य लोकजात यात्रा के दौरान मां नंदा की डोली विभिन्न गांवों और पड़ावों से गुजरते हुए वेदनी कुंड तक पहुंचती है, लेकिन बड़ी जात में यात्रा का मार्ग आगे हिमालय के ऊंचाई वाले क्षेत्रों से होकर होमकुंड तक जाता है।
यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को दुर्गम पहाड़ी रास्तों, ऊंचे बुग्यालों और कठिन मौसम का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद धार्मिक आस्था के कारण हजारों लोग इस यात्रा से जुड़ते हैं। अंतिम चरण में होमकुंड पहुंचकर मां नंदा की विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी।
12 सितंबर को रामणी पहुंचेगी यात्रा
Nanda Devi Raj Jat Yatra का यात्रा कार्यक्रम पहले से निर्धारित पड़ावों के अनुसार आगे बढ़ेगा। 5 सितंबर को कुरुड़ से रवाना हुई तीनों डोलियां अलग-अलग पड़ावों से गुजरते हुए 12 सितंबर को रामणी पहुंचेंगी। यहां विभिन्न देव डोलियों और छंतोलियों का मिलन होगा।
इसके बाद यात्रा आला, सितेल और कनोंल होते हुए आगे बढ़ेगी। यात्रा के दौरान विभिन्न गांवों में श्रद्धालु मां की डोली का पारंपरिक स्वागत करेंगे। स्थानीय लोग पूजा-अर्चना करेंगे और मां नंदा से सुख-समृद्धि की कामना करेंगे।
15 सितंबर को लाटू देवता मंदिर में होगा प्रवास
यात्रा के अगले महत्वपूर्ण पड़ावों में वाण स्थित लाटू देवता मंदिर शामिल है। 15 सितंबर को मां नंदा की डोली यहां पहुंचेगी और प्रवास करेगी। उत्तराखंड की धार्मिक मान्यताओं में लाटू देवता का विशेष महत्व है और नंदा देवी यात्रा से भी उनका गहरा संबंध माना जाता है।
इसके बाद यात्रा वाण से गैरोली पाताल की ओर बढ़ेगी। 18 सितंबर को उत्सव डोली वेदनी बुग्याल पहुंचेगी, जहां सप्तमी के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी। वेदनी बुग्याल इस यात्रा का एक प्रमुख धार्मिक पड़ाव है।
रूपकुंड और ज्यूंरागली से होकर आगे बढ़ेगी यात्रा
19 सितंबर को यात्रा और अधिक दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों की ओर आगे बढ़ेगी। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार डोली बगुवावासा, पातरनचैणियां और कैलवा विनायक होते हुए रूपकुंड तथा ज्यूंरागली के रास्ते शिलासमुद्र पहुंचेगी।
यात्रा का यह हिस्सा सबसे कठिन चरणों में माना जाता है। ऊंचाई वाले इलाकों में मौसम अचानक बदल सकता है और तापमान में भी गिरावट आती है। इसके बावजूद श्रद्धालु परंपरागत धार्मिक मान्यताओं के साथ यात्रा को आगे बढ़ाते हैं।
30 सितंबर को होमकुंड में होगा मुख्य धार्मिक अनुष्ठान
Nanda Devi Raj Jat Yatra का मुख्य धार्मिक आयोजन 30 सितंबर को होमकुंड में प्रस्तावित है। यहां मां नंदा की डोली के साथ विधि-विधान से पूजा-अर्चना और अन्य धार्मिक प्रक्रियाएं पूरी की जाएंगी। इसके बाद बड़ी जात यात्रा का समापन होगा।
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हर वर्ष बसंत पंचमी के अवसर पर नंदा देवी की लोकजात यात्रा की तिथि तय की जाती है। बड़ी जात इसी धार्मिक परंपरा का विस्तृत स्वरूप है, जिसमें मां नंदा की डोली लंबी हिमालयी यात्रा के बाद कैलाश की दिशा में आगे बढ़ती है।
2026 में बड़ी जात और 2027 में राजजात, क्यों बनी दो यात्राओं की स्थिति?
इस बार Nanda Devi Raj Jat Yatra को लेकर सबसे बड़ी चर्चा दो अलग-अलग आयोजनों को लेकर है। नौटी राजजात समिति और प्रशासन ने व्यापक यात्रा को वर्ष 2027 तक टाल दिया है। समिति ने पंचांगीय गणना के अनुसार 2026 में मलमास होने का हवाला देते हुए यात्रा स्थगित करने का फैसला किया।
इसके अलावा सितंबर के अंतिम दिनों में ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी और भारी बारिश की आशंका भी एक कारण रही। प्रशासन ने यात्रा मार्ग पर सुविधाओं और व्यवस्थाओं के अधूरे होने का मुद्दा भी उठाया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने पर सुरक्षा और आवास जैसी समस्याएं सामने आ सकती थीं।
कुरुड़ समिति ने क्यों नहीं मानी स्थगन की बात?
कुरुड़ मंदिर समिति का मानना था कि 2014 के बाद 2026 में 12 वर्ष पूरे हो रहे हैं और परंपरा के अनुसार यात्रा इसी वर्ष होनी चाहिए। समिति ने नौटी आयोजन समिति के फैसले से सहमति नहीं जताई और अपने स्तर पर 5 सितंबर से बड़ी जात यात्रा शुरू करने का निर्णय लिया।
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कुरुड़ पक्ष का कहना है कि इस धार्मिक आयोजन में उनकी ऐतिहासिक भूमिका महत्वपूर्ण रही है। उनका मानना है कि यात्रा का मूल स्वरूप ‘बड़ी जात’ है और समय के साथ इसे राजजात के नाम से अधिक पहचाना जाने लगा। यात्राइतिहास में हर बार 12 साल का अंतर नहीं रहा
नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा के इतिहास पर नजर डालें तो हर बार इसका आयोजन ठीक 12 वर्ष के अंतराल पर नहीं हुआ है। समिति के रिकॉर्ड के अनुसार 1968 में यात्रा आयोजित हुई थी। इसके बाद 1987 में यात्रा निकली, यानी दोनों यात्राओं के बीच 19 साल का अंतर रहा।
इसके बाद वर्ष 2000 में यात्रा आयोजित की गई। अगली यात्रा 2012 में प्रस्तावित थी, लेकिन 2013 की केदारनाथ आपदा के कारण आयोजन प्रभावित हुआ और अंततः 2014 में यात्रा संपन्न हुई। इस तरह इतिहास में परिस्थितियों के अनुसार यात्रा की तिथियों में बदलाव होते रहे हैं।
फिलहाल कुरुड़ से शुरू हुई Nanda Devi Raj Jat Yatra धार्मिक आस्था, लोक संस्कृति और हिमालयी परंपराओं का अनूठा संगम बनी हुई है। आने वाले दिनों में हजारों श्रद्धालु मां नंदा की डोली के साथ दुर्गम हिमालयी मार्गों से होकर आगे बढ़ेंगे और 30 सितंबर को होमकुंड में होने वाले मुख्य धार्मिक अनुष्ठान के साथ इस विशेष यात्रा का समापन होगा।
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